Tuesday, December 31, 2013


रूपान्तरण   


 दोपहर से ही उन दोनों का मूड खराब था। एक-दूसरे के व्यवहार को गलत मानते हुए, बिना करवट बदले एक-दूसरे की ओर पीठ किए लेटे थे। सोचते-सोचते समय के एक क्षण पर आकर निशा के अहं के कदम ठहर से गए। अन्तर्मन में चल रही पिक्चर को उसने बार-बार आगे-पीछे मूव करके देखा।
     क्या विद्यु सचमुच गलत था और वह सही?....उत्तर में सकारात्मक ध्वनि नहीं निकल पा रही थी। बात छोटी सी ही सही, पर विधु की बात में गलत क्या था। उसने आखिर इतना ही तो कहा था- परफारमेंस, परफारमेंस होती है। वह टी.वी. कार्यक्रम में नियोजित आर्टिस्टों द्वारा दी गई हो या गली-मोहल्ले की सड़कों पर घुमक्कड़ों के द्वारा। बल्कि घुमक्कड़ों द्वारा दी गई परफारमेंन्स कहीं स्वाभाविक होती है। इसलिए इन घुमक्कड़ों को भी जनता से उतना ही प्रोत्साहन पाने का हक है, जितना नियोजित टी.वी. आर्टिस्टों को। उसके द्वारा घुमक्कड़ों की तुलना भिखारियों से करने का विधु ने विरोध किया था।
     ‘‘तुम इन घुमक्कड़ बच्चों के गाने की परफारमेन्स पर इनका उत्साहबर्द्धन नहीं करना चाहती हो तो मत करो, पर इन्हें भिखारी मत कहो। मैंने इन्हें पांच रुपये देकर न तो घर लुटा दिया है और न इनको महिमा मण्डित कर दिया है। मुझे उनका गाना अच्छा लगा, सो प्रोत्साहन के तौर पर कुछ दे दिया। कभी सोचकर देखो, कितना प्यारा गाते हैं दोनों! घंटे-दो घंटे अपनी कला का प्रदर्शन करके ये कुछ कमा लेते हैं तो क्या गलत करते हैं? इनका बाप नहीं है, मां घरों में चौका-बर्तन करती है। इतना नहीं कमा पाती कि दो वक्त की दाल-रोटी के बाद इन्हें पढ़ा-लिखा सके। अपनी पढ़ाई का खर्चा ये अपनी कला की परफारमेन्स देकर निकालते हैं। 
     हो सकता है वे टी.वी. आर्टिस्ट कला को समृद्ध कर रहे हों, पर इन्हें कुछ देना भीख है तो उनकी परफारमेन्सेज को एप्रीसिएट करने के लिए तुम रोज मेसेजों पर बीस-तीस रुपये खर्च देती हो, वह क्या? उनको वोट/सपोर्ट करना कोई निशुल्क तो नहीं है। मैंने तो तुम्हें कभी नहीं टोका। परफारमेंस के बाद ये कुछ मांगते हैं तो वे भी कुछ मांगते हैं।
    विधु के द्वारा मेसेजों पर बीस-तीस रुपये खर्च कर देने की बात उसे चुभ गई थी। उसे लगा था जैसे विधु ने उसके एन्ज्वायमेंट पर फिजूलखर्ची का कमेन्ट कर दिया हो। पर शायद उसकी बात समझने का मेरा एंगिल गलत था। उसने तो अपनी बात समझाने के लिए दोनों स्थितियों में तुलना भर की थी। पर उसके कहने के ढंग में तीखापन भी तो बहुत था। वह प्यार से भी अपनी बात कह सकता था। पर तीखापन तो मेरी बात में भी कम नहीं था। फिर मैं इस बात पर उससे कई बार पहले भी उलझ चुकी हूँ। शायद उसका तीखापन इसी की प्रतिक्रिया रहा हो। जो भी हो...मुझे विद्यु को सॉरी....।
    और निशा ने करवट बदला। अपना एक हाथ विधु के शरीर पर रखा और धीरे से बोली, ‘‘सॉरी यार! अब माफ भी कर दो.... गलती हो गई...।

Saturday, May 5, 2012


डा. उमेश महादोषी 


दो लघुकथाएं 


पब्लिक सेवा



   मैं अपने केबिन में बैठा चार्ज टेकिंग रिपोर्ट को अन्तिम रूप दे रहा था कि हॉल में जोर-जोर से बोलने की आवाज मेरे कानों में पड़ी। हाल प्रबन्धक मि0 सक्सेना से एक कस्टमर, मि0 अरोड़ा उलझे हुए थे।
   ‘मुझे कनेक्टीविटी-वनेक्टीविटी से कुछ नहीं लेना-देना। मेरा पेमेन्ट तुरन्त करवाओ, मैं और इन्तजार नहीं कर सकता।‘
    ‘...देखिए अरोड़ा जी, मैंने कनेक्टीविटी न होने की कम्प्लेन्ट नोट करा दी है। आप कुछ मिनट इन्तजार कर लीजिए,
कनेक्टीविटी आते ही आपके चैक का पेमेन्ट करवा दूंगा।’
    ‘कनेक्टीविटी तो काम न करने का बहाना है। कनेक्टीविटी नहीं होगी, तो क्या बैंक बन्द कर दोगे?.....हकीकत तो यह है कि तुम लोग काम करना ही नहीं चहते हो। जब बिना कुछ किए तनखाह मिले, तो क्या जरूरत है काम करने की!...’
   ‘अरोड़ा जी, आप थोड़ा धैर्य रखिए। मुझे अपशब्द कहने से आपकी समस्या का समाधान नहीं हो जायेगा। ये तकनीकी समस्या है, समझने की कोशिश करिए। हम आपका काम करने के लिए ही बैठे हैं, पर कनेक्टीविटी का न होना हमारे स्तर से परे है।....’
    ‘इतना समय नहीं है मेरे पास।..... तुम लोगों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाये, तो पता चले। कोई दो रुपये की नौकरी भी नहीं देगा तुम जैसे नाकाराओं को........’ कहते हुए मि0 अरोड़ा पैर पटक कर जाने लगे। 
   मैंने इस प्रकरण को ध्यानपूर्वक देखा-सुना। मि0 सक्सेना का धैर्य और मि0 अरोड़ा की बेहूदगी ने मुझे एकबारगी अनियन्त्रित-सा कर दिया, पर पद की गरिमा और जिम्मेवारी के अहसास से मैंने अपने-आपको नियन्त्रित किया। चपरासी को कहकर मि0 अरोड़ा को अपने केबिन में बुलाया। मेरे केबिन में आते हुए भी मि0 अरोड़ा अपनी बेहूदगी का इजहार करने के लिए उताबले हो रहे थे, पर मेरे द्वारा शान्तिपूर्वक बैठकर बात करने के दृढ़ता भरे संकेत से शायद उन्होंने अपने-आप पर नियन्त्रण किया। इतने में मेरा इशारा पाकर चपरासी एक गिलास पानी ले आया, जिसे आफर किए जाने पर मि0 अरोड़ा ने पी लिया।
   ‘....आपने मुझे पहचाना?’
    मेरे प्रश्न पर मि0 अरोड़ा ने हल्का-सा गच्चा खाया, फिर अपनी अकड़ को कुछ बरकरार और कुछ नियन्त्रित-सा करते हुए बोले- ‘...आप नए शाखा प्रबन्धक हैं शायद!’
    ‘...मेरा मतलब है कि.... हम पहले भी मिल चुके हैं?’
    ‘....जी, मुझे तो कुछ याद नहीं आ रहा.... आप तो अभी एकाद सप्ताह में ही आए हैं?’
    ‘कोई बात नहीं, मैं याद दिला दूंगा। पहले उस समस्या पर कुछ बात कर ली जाए, जिसकी बजह से आप इतना अधिक नाराज हो रहे हैं कि सामान्य शिष्टाचार भी भूल गए। एक बात बताइए, यदि आपको किसी व्यक्ति से अर्जेंट बात करनी हो और आपके मोबाइल से लाइन न मिले, तो आप क्या करेंगे?’
    ‘लाइन मिलने तक ट्राई करूंगा। पर टेलीफोन करने और पैसे निकालने में फर्क होता है!’
    ‘बात तकनीकी सिचुएशन की हो, तो टेलीफोन और बैंक की कनेक्टीविटी में कोई फर्क नहीं होता। सक्सेना जी ने आपके साथ न तो कोई दुर्व्यवहार किया है और न हीं जानबूझकर आपको परेशान किया है। तकनीकी फाल्ट हम सबकी साझा समस्या है। आपको परेशानी हो रही है, हम जानते हैं, पर परेशानी हमें भी होती है। हालांकि आपके सामने एटीएम का विकल्प भी है, पर वहां भी कुछ समस्या हो सकती है, दूसरे इसके लिए हम आपको विवश नहीं कर सकते। लेकिन किसी भी समस्या का समाधान अपने और दूसरे- दोनों के पक्षों को समझकर ही किया जा सकता है।’
   ‘पर, ये तो आपकी आन्तरिक समस्या है। हमें क्या लेना-देना इससे?’
   ‘सिर्फ हमारी नहीे, पूरे सिस्टम की समस्या है जनाब! हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। फिर भी शिकायत करना और किसी शरीफ व्यक्ति का अपमान करना दो अलग-अलग बाते हैं। आप याद करिए, कल कुछ जरूरी दवाइयां लेने मैं आपकी दुकान पर गया था। आप किसी व्यक्ति से टेलीफोन पर व्यक्तिगत बातें कर रहे थे। मैं दस मिनट तक खड़ा रहा, बीच-बीच में आपसे दवाइयां देने के लिए रिक्वेस्ट करता रहा, पर आपने मेरी बात को ठीक से सुनना तक उचित नहीं समझा। जब मैंने जल्दी में होने की दुहाई दी तो आपने दो-टूक कह दिया- ‘ज्यादा जल्दी में हो तो कहीं और से ले लो।’
   मैंने फिर दूसरा स्टोर दूर होने और मरीज को जल्दी दवा दिए जाने की जरूरत आपको बतानी चाही तो आपने बेहद बेरुखी से कह दिया- ‘मैंने आपकी परेशानी को समझने का कोई ठेका नहीं ले रखा है!’ जबकि आप चाहते तो इतनी देर में बातें करते-करते मुझे दवाइयां दे सकते थे। क्या आप समझ सकते हैं कि उस वक्त आपका व्यवहार कितना गलत था और इस वक्त भी?.....
   ‘मेरी बात अलग है, मैनेजर साहब। मैं एक प्राइवेट मेडीकल स्टोर का मालिक हूँ और आप यहाँ एक सार्वजनिक संस्था में नौकरी करते हैं। आप हमारी सेवा के लिए बैठे हैं....बदला लेने के लिए नहीं!’ मि0 अरोड़ा अपना दम्भ छोड़ने को तैयार नहीं थे।
   इस बीच कनेक्टीविटी आ चुकी थी, और मेरे इशारे के अनुसार मि0 सक्सेना मि0 अरोड़ा का पेमेन्ट चपरासी के हाथों मेरे पास भिजवा चुके थे। मैंने पेमेन्ट मि0 अरोड़ा को पकड़ाते हुए कहा- ‘आपका काम हो चुका है क्योंकि हम यहाँ काम करने के लिए बैठे हैं। पर यह बात आप भूल जाइए कि आप एक प्राइवेट स्टोर के मालिक हैं। आप भी पब्लिक की सेवा के लिए उसी तरह बैठे हैं, जैसे हम बैठे हैं। बल्कि यहां आपको जो असुविधा हुई, वह हमारे नियन्त्रण से बाहर के कारण से हुई, पर आपने जो असुविधा मुझे  पहुंचाई थी, वह आपने जान-बूझकर अपने विवेक का गलत प्रयोग करके पहुंचाई। मैं आपसे बड़ी जरूरत में था, मैंने इसके बावजूद गुस्सा जाहिर नहीं किया, पर आपने......! रही बात बदले की, मैंने आपसे जो कुछ कहा वह बदला लेने या आपके व्यवहार के प्रति नाराजगी दिखाने के लिए नहीं कहा है। हम आपको सिर्फ इतना समझाना चाहते हैं कि जिम्मेदारी की भावना हर व्यक्ति के अन्दर होनी चाहिए। जिस समस्या के कारण आपको बैंक में परेशानी हुई, उसके समाधान के साथ बहुत सारे लोग जुड़े हैं और तकनीक भी। हर सिस्टम लोगों से मिलकर बनता है और एक दूसरे को समझने एवं व्यवहार से चलता है। हमारे लिए आप बेहद महत्वपूर्ण हैं, पर आपसे रिक्वेस्ट है कि व्यवहार और पब्लिक सेवा के अर्थ को उसके सही रूप में समझिए।...’ कहते हुए मैंने अपनी सीट से उठते हुए उन्हें भी अप्रत्यक्षतः जाने का विनम्र संकेत कर दिया था। 




चने वाला


   ‘‘आज तो बहुत बुरा फंसा।..... जिन्दगी में दुबारा इतनी भीड़ भरे ट्रेन के डिब्बे में नहीं चढ़ूँगा। स्लीपर क्लास में पेनाल्टी लगती, पर कम से कम खड़े होने और सांस लेने की जगह तो मिल जाती!.......’’। सवारियों से बुरी तरह ढुंसे ट्रेन के सामान्य डिब्बे में घुस आने के पश्चाताप और भयंकर परेशानी से पीड़ित मैं अपने-आपको कोस रहा था। इतनी भीड़ आज से पहले मैंने कभी नहीं देखी थी। एक-दूसरे के पैरों को कुचलते-कुचलवाते लोग एक दूसरे के साथ धक्का-मुक्की करते और गुस्से से लाल-पीले होते अपने-अपने पैर टिकाने की जगह पाने के लिए पसीना बहा रहे थे। मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बनकर कभी अपने-आपको कोसता, कभी अपनी भड़ास दूसरों पर निकालता। किसी तरह किसी एक के पैर के नीचे से अपना एक पैर निकाल पाता, तब तक किन्ही दूसरे महानुभाव का कोई पैर मेरे दूसरे पैर का भुर्ता बनाने पर उतर आता। कभी किसी की बद्बू-भरी सांस मेरे नथुनों के साथ जबरदस्ती करने लगती तो कभी किसी की जुराबों से निकली भड़कीली बू दिमांग की नसों को फाड़ने पर उतारू हो जाती। आज तो सचमुच बहुत बुरा फंस गया था।
   अचानक गेट के सामने वाली गैलरी की ओर से जोर-जबरदस्ती और झड़पों से मिश्रित शोर ने ध्यान खींचा। एक पच्चीस-छब्बीस वर्ष का लड़का, जिसकी एक टांग लकवा या ऐसी ही किसी बीमारी से ग्रस्त होने के कारण निष्क्रिय थी, लोगों से उलझता-झिड़कता एक लाठी के सहारे जगह बनाता हमारी ओर बढ़ा आ रहा था। बड़ी कुशलता के साथ अपनी लाठी कहीं भी भीड़ में घुसाकर किसी ऊपरी वर्थ के साथ टिका देता, फिर बड़ी-बड़ी तनियों के सहारे गले में लटकाए बड़े और भारी से थैले को बैलेंस-सा करता हुआ लाठी के साथ पैर टिकाता और ऊपरी वर्थों का तिनका-सा सहारा लेता हुआ आगे बढ़ता। जल्दी ही वह मेरे करीब आ पहुंचा। गजब की फुर्ती से उसने मेरे आस-पास के दो-तीन लोगों को हिला-डुलाकर थोड़ी-सी जगह बनाई, लाठी का निचला सिरा सामने वाली वर्थ के साथ और ऊपरी सिरा डिब्बे की दीवार से खिड़की के पास टिकाया और लाठी के सहारे लटका हुआ सा स्थिर हो गया। थैले को घुटनों पर रखकर हल्का-सा खोला और जोर की एक आवाज लगाई- ‘‘करारे-भुने मसालेदार चने......। स्वाद न हो तो पैसे वापस।..... एक बार खाओगे तो बार-बार चाहोगे.....।’’ 
   ‘‘बाप रे! इतनी भीड़ में एक लाठी के सहारे, विकलांग होने के बावजूद कितनी फुर्ती से अपनी दुकान जमा ली इसने तो!’’ मैं मन ही मन उसकी फुर्ती, साहस और प्रबन्धकीय कौशल से हक्का-बक्का बुदबुदाया। जो लोग उसके इस तरह भीड़ में घुस आने से कोफ्त महसूस कर रहे थे, देखते-देखते वे ही लोग उसके चनों के एक-एक पैकेट के लिए टूट-से पड़ रहे थे। भरी भीड़ के कारण मिली पीड़ा को सब लोग किस तरह से भूलकर चनों के स्वाद में खो रहे थे! मैं उससे अपनी तुलना में खोने लगा- ‘कहां यह और कहां मैं! भीड़ से थोड़ी-सी पीड़ा क्या मिली कि मैं तिलमिला गया, और यह? किस अदम्य साहस से अपनी रोजी-रोटी बिना किसी गिले शिकवे के कमा रहा है....’’।
   तभी पास में खड़े एक महाशय, जो शायद उसके पसीने से आ रही बदबू से परेशान होने लगे थे, खिशियाकर बोल पड़े- ’एक तो इतनी भीड़, सांस लेना तक दूभर हो रहा है, ऊपर से ये भिखमंगा जाने कहां से घुस आया!’
   ‘‘.....ऐ बाबू साहब! चने नहीं खाने हैं तो मत खाइए, पर बात जरा तमीज से करिए। मैं भिखमंगा नहीं हूूँ और नहीं किसी के साथ जोर-जबरदस्ती कर रहा हूँ। गरीब हूँ, पर अपनी रोजी-रोटी मेहनत करके कमा रहा हूँ।...’’
   अब तक वह चालीसेक पैकेट बेचकर दो सौ रुपये के करीब की बिक्री करके आगे बढ़ने को तैयार था। मैं उन महाशय को दिये उसके शालीन लेकिन दृढ़ जवाब से खुश था। मेरी दृष्टि उसकी लाठी, उसकी लकवाग्रस्त-सी टांग और उसके चेहरे पर बार-बार फिसल रही थी। उसने शायद मेरी मनःस्थिति को कुछ भांप लिया, बोला- ‘‘क्या हुआ बाबू जी?’’
   ‘‘कुछ नहीं.....’’। मेरे मुंह से निकला, पर जैसे मैंने खुद ही अपने शब्दों को नहीं सुना। अनायास एक हाथ से जेब से पाँच का सिक्का निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिया। वह चने का पैकेट देकर आगे बढने लगा। उस भीड़ भरे डिब्बे में किसी प्रकार मैं चने के दाने मुँह में डालने लगा लेकिन मेरी आंखें लगातार उसकी लाठी और फुर्तीलेपन का पीछा कर रही थीं। गोया जीवन का एक नया दर्शन मेरी चेतना में कहीं कोंध रहा था।

Friday, September 9, 2011

चौकीदार

   किचन से बर्तनों के खड़कने की आवाज सुनकर मेरी नींद खुल गयी। घड़ी पर नजर डाली तो साढ़े पांच बजे थे।......गार्गी जल्दी उठ गयी?.....पर किचन में इतनी जल्दी जाने की क्या जरूरत.....! मैं उठा और सीधा किचन में..... ‘क्या हुआ? करीब पौना घंटा पहले ही उठ गईं और चाय भी अभी से......?’
   ‘हाँ, करीब तीन बजे बाथरूम जाने को उठी थी, बस उसके बाद नींद आई ही नहीं। सिर कुछ भारी सा लगने लगा, तो सोचा चाय पीकर शायद कुछ आराम हो जाये..... बस!’
   ‘लगता है आज फिर कोई टेंशन पाल लिया।.... तुम क्यों इतना अधिक सेन्सेटिव होती जा रही हो? कैसे चलेगा इस उम्र में? भई अब निश्चिन्त होकर आराम से गुजारने के दिन आये तो तुम अनावश्यक चिन्ताओं में खोने लगी हो?’ खैर आज हम जल्दी उठ ही गये हैं, तो चाय पीकर आज जल्दी ही निकलते हैं। आज की मॉर्निग वाक में थोड़ा लांग डिस्टेंस कवर करेंगे, केन्ट की ओर निकलेंगे आज हम!’
   ‘ठीक है, पर आज पहली तारीख है, वो वेचारा चौकीदार आयेगा पैसे मांगने। आज आप मना नहीं करेंगे? हमें रिटयरमेन्ट के बाद इस अपने घर में आये तीन महीने हो गये, आपने एक बार भी उसे पैसे नहीं दिए। आज तीनों माह के 50 रुपये के हिसाब से डेढ़ सौ रुपये उसको आपने देने ही होंगे। आज मैं आपके मुँह से ना या उसके लिए डाँट-डपट हरगिज नहीं सुनूँगी।....पता नहीं क्यों मुझे लग रहा है.... वह बेचारा बेहद जरूरतमन्द है। पूरी जिन्दगी न जाने आपने कितने जरूरतमन्दों की मदद की, इस बेचारे गरीब चौकीदार को थोड़े से पैसे देने में आप पचासों बाते उसे कह चुके, पर फूटी कौड़ी उसके हाथ पर नहीं रखी!’ कहते हुए गार्गी दो कपों में छानी हुई चाय और अपने परेशान चेहरे को लिए लॉबी में पड़ी टेबल की ओर बढ़ गई।
   ‘... फिर वही चौकीदार का रोना.......’ मैं उसके पीछे आते हुए लगभग झल्लाई आवाज में बोला।
   ‘नहीं मैं अब आपकी एक नहीं सुनूँगी, आपके हर सवाल का जवाब मिल चुका है। पुलिस वैरीफिकेशन इसलिए नहीं हुआ, कि पुलिस उस गरीब की सुनती नहीं। उन्हें उस गरीब से भी दो-तीन सौ रुपये चाहिए। उसके पास अपना गाँव का राशनकार्ड तो है ही, आप ही मोहल्ले के कुछ लोगों को लेकर क्यों नहीं थाने चले जाते हैं, बैंक में बड़े अफसर रहे हो, पुलिस कुछ तो सुनेगी आपकी? मोहल्ले में किसने उसे रखा है, कौन-कौन उसे पैसे देता है..... तो जैसे आप सोचते हो, अधिकांश वैसा ही सोचने वाले लोग हैं इस मोहल्ले में। जोशी जी की बात पच्चीस-तीस परिवार मानते हैं मोहल्ले में, कृष्णपाल जी की पैठ भी बीसेक परिवारों में है और ये दोनों ही लोग आपकी इज्जत करते हैं। आप ही क्यों नहीं इनसे मिलकर चौकीदार का एक सिस्टम बनाने की पहल कर देते हो? बाकी मोहल्ले वाले भी कोशिश करने पर जुड़ ही जायेंगे! उस गरीब का भला हो जायेगा और मोहल्ले को भी एक ईमानदार चौकीदार मिल जायेगा।’ चाय पीते हुए गार्गी बोली थी।
   ‘पर यह रेगुलर तो आता नहीं है, जब पैसे लेने होते हैं तो चार-पांच दिन घूम जाता है। कौन इसके पचड़े में पड़े! फिर हमारी कालौनी तो वैसे भी सेफ है, गाँव से आये कई धाकड़ लोग रहते हैं इसमें। सात-आठ साल तो हमें हो गये मकान बनाए, कोई दुर्घटना घटते सुना कभी इस कालौनी में?’ मैंने चाय सिप करते हुए गार्गी को समझाना चाहा।
  ‘रेगूलर न होना उसकी मजबूरी भी तो हो सकती है। सौ परिवारों के मोहल्ले में से दस लोग भी पैसे नहीं देते हैं। ऐसे में हो सकता है कि कई मोहल्लों में कुछ-कुछ दिन गस्त करता हो। हो सकता है दिन में भी थोड़ा बहुत कुछ और काम भी करता हो, इसलिए एक-दो दिन की छुट्टी कर जाता हो, आखिर कभी-कभी नींद पूरी करना भी तो जरूरी है। रही बात कालोनी के सेफ होने की, सो कालोनी की छोड़ो, आज के समय में संसद भी सेफ नहीं है। मैं तो कहती हूँ चौकीदार के साथ मोहल्ले वालों को कुछ ऐसा सिस्टम भी बनाना चाहिए कि चौकीदार शोर मचाये, तो उसके शोर पर लोगों की कुछ प्रतिक्रिया भी आ सके।’ गार्गी के तर्क भावुकता में पगे हुए थे।
   ‘पर तुम यह कैसे कह सकती हो कि यह चौकीदार ईमानदार है! इन चौकीदारों का कोई भरोसा नहीं होता? आवास विकास में श्रवण भाई के परिवार के साथ जो उस रात हुआ, वो तो तुम जानती ही हो! उस रात जब उन्हें कहीं बाहर जाना था, तो गेट बन्द करने से पहले मिले हल्के से मौके का फायदा उठाकर चौकीदार किस तरह घर में छुप गया और उनके जाते ही......! वो तो अच्छा हुआ कि कुछ सामान भूल गये थे श्रवण जी, सो स्टेशन के रास्ते से ही लौटना पड़ा और उन्होंने भाभी जी को बचा लिया। भागते-भागते वह चौकीदार उन श्रवण जी को भी दो लाठियां जमा गया था, जो हर महीने उसे तय साठ की जगह सौ रुपये का नोट थमा देते थे!
   ‘हाँ, पर दोनों के चेहरों को देखकर अन्तर किया जा सकता है। आपने तो हजारों लोगों से डील किया है, और चेहरा देखकर इन्सान की पहचान के दावे करते रहे हो? फिर वह तो पुलिस से वैरीफाइड भी था.... क्या हुआ, बस जेल ही तो हुई उसे? पुलिस वैरीफिकेशन से चरित्र तो वैरीफाई नहीं हुआ उसका? अपने सुयोग को परिचय के अभाव में कानपुर में रूम ढूंढ़ने में कितनी परेशानी हुई थी। एक चाय वाले ने चेहरे पर विश्वास करके ही तो उसकी मदद की थी! मैं पूरे विश्वास से कह सकती हूँ यह लड़का वैसा चौकीदार नहीं है, वल्कि मुझे तो वक्त का मारा लगता है। इस पर विश्वास किया जा सकता है। मैं सिस्टम को बाईपास करने की बात नहीं कह रही हूँ। उसके बारे में पता करो, अपने को सन्तुष्ट करो, पर उसकी मदद करो। वैसे भी महीने में पचास रुपये देकर लुट तो नहीं जायेंगे हम! आज तो मुझे बड़ी घबराहट हो रही है, ईश्वर न करे वह किसी बड़ी परेशानी में हो, कहीं उसका बच्चा बीमा....!’
   ‘ऐसा क्यों लग रहा है तुम्हें?
   ‘वह जिस दिन भी गश्त पर आता है, सुबह साढ़े चार-पांच बजे तक चक्कर लगाता है। पर आज तीन बजे से मेरी आंख खुली है, तबसे मैंने उसका खड़का नहीं सुना।’ कहते-कहते गार्गी का गला भरने सा लगा था।
   तभी हमारे घर की कालवेल बजी। मैंने उठकर दरवाजा खोला, बाहर पड़ौसी मदनजी का बेटा अनुराग था, जो सुबह-सुबह जोगिंग पर जाया करता था.... लग रहा था दौड़कर आ रहा है..... हाँफता हुआ सा बोला, ‘अन्कल आपने सुना, हमारे मोहल्ले के चौकीदार की तीन नम्बर गली में चोरों ने हत्या कर दी। उस गली में वो त्रिखा जी रहते हैं न, वो लोग कहीं बाहर गये हुए हैं, कल रात उनके घर में चोर घुस आये, चौकीदार ने देख लिया। उसने आस-पास के कई घरों के लोगों को जगाने की कोशिश की पर कोई निकला ही नहीं। तब उसने शोर मचाया जिसे सुनकर चोर बिना चोरी किए भाग तो गये लेकिन भागते-भगते उसके सीने पर चाकू से वार कर गये। वो वेचारा दो दिन से भूखा था, सो कमजोरी की वजह से भागकर अपना बचाव नहीं कर सका। वहीं गली नं. तीन में उसकी लाश पड़ी है। पुलिस आ गई है। उसकी बीबी के साथ चार-पाँच साल की बच्ची है। दहाड़ें मारकर रो रही है। उसके पास तो दाह-संस्कार लाइक पैसे भी नहीं हैं। अंकल सब लोग मिलकर उसकी मदद कीजिए न!......’ वह एक सांस में ही सब कुछ कहकर मेरी ओर देखने लगा।
   मैंने पीछे मुड़कर देखा मेरी पत्नी गार्गी फर्श पर बेहोश पड़ी थी। शायद उसने अनुराग की सारी बात सुन ली थी। 

Saturday, August 6, 2011

डा. उमेश महादोषी की तीन लघुकथाएं
 भू-मण्डल की यात्रा   
हरीचन्द जी ने जैसे-तैसे साल भर से बन्द पड़े मौके-बेमौके काम आ जाने वाले छोटे से पैत्रिक घर का दरवाजा खोला। एक कोने में पड़े पुराने झाड़ू से जाले और फर्श को किसी तरह थोड़ा-बहुत साफ किया, पुराने सन्दूक से पुरानी सी चादर ढूँढ़कर फर्श पर बिछायी, और लेट गये। आज शरीर ही नहीं, उनका मन भी पूरी तरह टूटा हुआ था। नींद आने का सवाल ही कहां था, किसी तरह बेचैनी को सीने में दबाकर आँखे मूँद लीं। एक-एक कर जिन्दगी की किताब के पन्ने खुद-ब-खुद पलटते चले गये...।
    बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद कितनी मेहनत करके पाई-पाई जोड़कर उन्होंने वह सुन्दर-सा घर बनाया था, एक दुकान भी कस्बे के मेन बाजार में खरीदकर अपना कारोबार जमाया था। बेटे अर्जुन को भी बी.टेक. की शिक्षा दिलवा ही दी थी। ग्रहस्थी की पटरी लाइन पर आने के साथ थोड़े सुख-सुकून के दिन आये ही थे, कि पत्नी उर्मिला दुनियां से विदा हो गई। उसके जाते ही जैसे उनकी दुनियां उजड़ने लगी। छः माह भी न हुए थे कि अर्जुन ने लन्दन से एम.एस. करने की जिद ठान ली थी। बहुत समझाया था उसे- ‘बेटा तू इतनी दूर परदेश में होगा, जरूरत पड़ने पर किसे तू याद करेगा और किसे मैं। यहां अपने देश में कम से कम एक-दूसरे का सहारा तो है। फिर आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं है कि विदेश का खर्चा वहन किया जा सके....। पर बेटे के तर्को के आगे वह विवश हो गये थे- ‘पापा कैसी बातें करते हो आप! आज जितनी देर हमें अपने प्रदेश की राजधानी पहुँचने में लगती है, उससे कम समय में लन्दन पहुँचा जा सकता है। आज सारी दुनियां सिमिटकर छोटा सा गांव बन गई है। रोज हम आपस में टेलीफोन पर बात कर लिया करेंगे। जरूरत पड़ने पर कितनी देर लगेगी यहां आने में। रही बात पैसों की, तो आपके अकेले के रहने के लिए पुराना घर काफी है। इस नये घर को बेच देते हैं, अच्छी खासी रकम की व्यवस्था हो जायेगी। फिर मैं वहां कोई पार्ट टाइम जॉब भी कर लूँगा। दो साल के बाद तो मुझे अच्छा और स्थाई जॉब मिल ही जायेगा, तब आप भी वहीं हमारे साथ रहेंगे। क्या जरूरत रहेगी इस छोटी-मोटी दुकानदारी की? आप तो पूरे भू-मण्डल की यात्रा करना....’। और हुआ भी वही, मकान बेचा और बेटे ने सीधे लन्दन का टिकिट.....।
    पूरे दो साल बाद एक दिन अचानक अर्जुन भारत यानी पापा के पास आया। ‘पापा मुझे लन्दन में ही एक बड़ी कम्पनी में बहुत अच्छी स्थाई नौकरी मिल गई है। आपको भी मेरे साथ ही चलना होगा। वहां मैंने एक फ्लैट भी देख लिया है, उसके लिए थोड़े पैसों की जरूरत भी है। अब आपको दुकानदारी की जरूरत तो रही नहीं और यहाँ इण्डिया में हमें आना भी नहीं है, इसलिए दुकान और पुराना घर भी बेच दो। इससे फ्लैट के लिए जरूरी पैसों की व्यवस्था हो जायेगी। फ्लैट रूबिया को बेहद पसन्द आया है, आपको भी अच्छा लगेगा.....।’
   झटका ता लगा था, पर जैसे-तैसे अपने-आपको सम्हालकर पूछा था- ‘ये रूबिया कौन है, कहां की रहने वाली है, क्या करती है और तेरा क्या रिश्ता है उससे?’
   ‘पापा, वो मेरी कम्पनी में ही जॉब करती है। रहने वाली पाकिस्तान की है। हम दोनों एक दूसरे को बहुत पसन्द करते हैं, आपको भी अच्छी लगेगी। आपके वहाँ चलते ही हम शादी कर लंेगे......।’ तब भी कितना समझाया था- ‘बेटा तू अपनी नौकरी कर और मुझे यहीं मेरे वतन में रहने दे। फ्लैट साल-दो साल बाद भी तू ले सकता है। जहाँ तक बात बेटा एक पाकिस्तानी लड़की से शादी करने की है, सो यह ठीक नहीं रहेगा। अलग-अलग धर्मों का होने पर एक बार निर्वाह हो भी जाये, पर साथ में तुम दोनों का सम्बन्ध दो अलग-अलग ऐसे देशों से है, जिनकी पारस्परिक विरोध की जड़ें बहुत गहरी हैं। और दोनों देशों के निवासियों की अपने-अपने देश के साथ आस्थाएं और भावनाएं भी उतनी ही गहरी हैं। इसलिए तुम दोनों और दोनों के पारिवारिक जनों के बीच ऐसे बहुत सारे मौके आ सकते हैं, जब जाने-अनजाने इन आस्थाओं और भावनाओं के चलते एक-दूसरे को समझना और सहन कर पाना असम्भव हो जायेगा। इसलिए मेरी सलाह यही है कि एक-दूसरे के प्रति भावनात्मक लगाव को सिर्फ दोस्ती तक ही रहने दो....।’
    पर अर्जुन कहाँ सुनने वाला था। ‘पापा, फिर वहीं घिसी-पिटी बातें लेकर बैठ गये। दुनियां बहुत बदल गई है, आज हम देशों की सीमाओं से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। न रूबिया पाकिस्तान की बन्धुआ है और न मैं हिन्दुस्तान का। पापा आप भी इन संकुचित सीमाओं से ऊपर उठ जाओ। हमारा देश पूरी दुनियां है........।’ लम्बा सा भाषण दे डाला था, अर्जुन ने। हरीचन्द जी की एक न चली, किसी प्रकार बेटे को समझा-बुझा कर इस पैत्रिक मकान को न बेचने पर ही राजी कर पाये थे। दुकान पड़ोसी लाला भीम सिंह जी को बेची और फिर वही हुआ, जो बेटे ने चाहा। एक साल भी नहीं बीता, कि परसों वो निष्ठुर दिन भी हकीकत बनकर सामने आ गया, जिसकी आशंका वह व्यक्त कर चुके थे।
    अर्जुन के दोस्त वरुण के पापा हरेन्द्र जी घर आये थे उनसे मिलने। हमवतन और हमउम्र से मिलकर बातों में दोनों भूल ही गये कि वे लन्दन मंे बैठे हैं। उसी दिन दुर्भाग्य से आतंकियो ने मुम्बई पर हमला कर दिया। इस हमले की खबर टी.वी. पर देखी-सुनी तो चर्चा का बिषय बदल गया। चर्चा के बीच में पाकिस्तान और उसकी पाकिस्तानियत कब आ गई, पता ही नहीं चला। यह भी याद नहीं रहा कि घर में पाकिस्तानी बहू बैठी है। हरेन्द्र जी के घर में रहते हुए तो कुछ नहीं हुआ, पर उनके जाते ही क्या कुछ नहीं हुआ....! ‘मेरे घर में रहकर मेरे ही ऊपर अविश्वास करते हो? यदि विश्वास नहीं था तो शादी क्यों की थी बेटे के संग? बुड्ढे अब मैं तुझे एक दिन भी नहीं रुकने दूँगी यहाँ.....।‘ तमाम मिन्नतों के बावजूद बहू ने अर्जुन के दो दिन बाद आफीशियल टूर से लौटने तक भी घर में नहीं रूकने दिया। एजेन्सी से एयर टिकिट मंगाकर हवाई जहाज में बैठाते हुए उसने एक बार भी नहीं सोचा कि ये इस उम्र में भारत जाकर भी किसके सहारे और कैसे अपना जीवन बसर करेगा.......! सोचते और आँसू बहाते हरीचन्द जी की आँख कब लग गई, पता ही नहीं चला। और जब आँख खुली तब अगले दिन का सूरज भी सिर चढ़ रहा था।
  थोड़ी देर के लिए वह फिर उन्हीं विचारों में खोने लगे। पर अचानक उन्होंने अपने आँसू पोंछ डाले, ‘बहुत मान ली बेटे की जिद। अब और नहीं....! जीविका का अपना कोई साधन नहीं है तो क्या, लाला भीम सिंह जी से मिलूँगा, भले आदमी हैं, अपनी दुकान पर सेल्स मेन तो रख ही लेंगे।....न...नहीं, जिस दुकान का मालिक था, उस पर नौकर.... अरे! काहे की शर्मिन्दगी.... भू-मण्डल की यात्रा की इतनी कीमत तो......!’
भू-मण्डल के स्वामी
   ‘नहीं सर, इतने सम्वेदनशील विषय पर मैं किसी विदेशी विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी की सलाह नहीं दे सकता। सर मेरा अनुमान है कि इससे हमारे विश्वविद्यालय ही नहीं, देश को भी भविष्य में नुकसान हो सकता है। प्रो. जयेन्द्र और प्रो. नारंग जैसी प्रतिभाओं का हमें बहुत सोच समझकर और देश के हित में उपयोग करने की रणनीति बनानी चाहिए। मैं उन दोनों के बिषयों कम्प्यूटर विज्ञान और न्यूक्लियर विज्ञान के समन्वय से एक नया कोर्स तैयार करने और उसे अपने विश्वविद्यालय में चलाने के आपके विचार से उत्साहित हूँ और उसका पूरा समर्थन भी करता हूँ। पर सर, मेरा मानना है कि हमारे ये दोनों युवा प्रोफेसर्स किसी भी विदेशी प्रोफेसर से इस नए बिषय पर कहीं ज्यादा सक्षम सिद्ध होंगे।’ प्रति-उपकुलपति प्रो. सिन्हा ने अपनी दलील उपकुलपति प्रो. राठौर के सामने रखी। प्रो. राठौर ने एक बार सोचा और प्रो. सिन्हा को समझाते हुए बोले- ‘सिन्हा जी, आपने अपनी स्पष्ट राय मेरे सामने रखी, मुझे अच्छा लगा। पर यह प्रोग्रेसिव नजरिया नहीं है। आज के ग्लोबलाइजेशन के जमाने में इतना क्लोज्ड दायरे बनाकर नहीं चला जा सकता। कुछ रिस्क भी लेने ही पड़ते हैं। फिर हमारे मैनेजमेन्ट और केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री महोदय की भी यही इच्छा है कि इस बिषय पर हमें उनके द्वारा प्रस्तावित विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी करनी ही चाहिए। कुछ फायदा उनसे हमारे विश्वविद्यालय और देश को होगा, तो कुछ फायदा तो दूसरा पक्ष भी उठायेगा ही। हमारे दोनों प्राफेसर्स प्रतिभाशाली हैं, उनके काम से ही हमारे नीलमणि विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनी है, पर अभी भी हमारा भावी साझेदार विदेशी विश्वविद्यालय और उसके प्रोफेसर्स हमसे बहुत आगे हैं। फिर इस पी.जी. कोर्स के लिए निर्धारित चौबीस माह में से पहले इक्कीस माह तो हमारे ही पास हैं। हमारी डिग्री के आधार पर ही मात्र तीन माह का अन्तिम प्रशिक्षण और प्रोजेक्ट वर्क ही तो विदेश में होना है।’
   ‘सर, यह भी तो एक बेहद अटपटा सा नियम बनाया जा रहा है। ऐसा कहीं होता है कि एक विश्वविद्यालय की प्रदत्त डिग्री पर अन्तिम मोहर कोई दूसरा विश्वविद्यालय लगाये? मुझे तो इसमें एक गहरी साजिश नजर आ रही है।’
   ‘क्या सिन्हा, तुम भी ऊलजलूल बातें सोचते रहते हो, स्पेशल कोर्स के लिए मैनेजमेन्ट और सरकार कोई स्पेशल प्रावधान रखना चाहती है, तो तुम्हें इसमें साजिश नजर आने लगी! जब कोई नया नियम पहली बार बनता है, तो हमेशा ऐसा ही होता है। अब आप प्रो. जयेन्द्र और प्रो. नारंग के साथ हम दोनों की बैठक अरेन्ज कराओ और उसके बाद पाठ्यक्रम की तैयारी भी। साझेदारी के बारे में हमारे चान्सलर और प्रो. चान्सलर महोदय निश्चय कर चुके हैं और हम उस बारे में उन लागों को अब डिस्टर्व नहीं करेंगे।’ कहते हुए उपकुलपति महोदय ने अपनी कुर्सी से उठते हुए बैठक सम्पन्न होने का इशारा किया और प्रति उपकुलपति जी को जैसे तनाव से बाहर खींचने की कोशिश में बोले- ‘चलो यार! एक्जीक्यूटिव केन्टीन तक टहलते हुए चलते हैं, वहां बैठकर एक-एक कप चाय का आनन्द लेंगे। रजिस्ट्रार नारायणन को भी बुलवाता हूँ।’
    कुछ ही दिन में कम्प्यूटर विज्ञान और न्यूक्लियर विज्ञान के समन्वय से पी.जी. स्तर का एक नया और विशेष पाठ्यक्रम प्रो. जयेन्द्र और प्रो. नारंग ने तैयार कर दिया, जो पूरे देश में अपनी तरह का अलग पाठ्यक्रम था। लक्ष्य था कम्प्यूटर विज्ञान और न्यक्लियर विज्ञान के पारस्परिक समन्वय की नई सम्भावनाओं की खोज तथा इस विषय पर कुछ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के भावी वैज्ञानिक तैयार करना। अमेरिका के सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय को तयशुदा नियमों के साथ अन्तर्राष्ट्रीय साझेदार बनाया गया। भारत के प्रधानमंत्री जी के द्वारा पाठ्यक्रम का शुभारम्भ किया गया। पहले बैच में देश के बेहद प्रतिभाशाली पन्द्रह छात्रों को प्रवेश मिला। इक्कीस माह तक कड़ी मेहनत और नई-नई खोजों और समन्वय से दोनों युवा प्रोफेसर्स ने पी.जी. स्तर के इस पाठ्यक्रम को शोध स्तर तक पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इक्कीस माह के बाद जब इन पन्द्रह भावी वैज्ञानिकों को नीलमणि विश्वविद्यालय ने अमेरिका रवाना करने से पूर्व एक शानदार कार्यक्रम में अनन्तिम डिग्री सौंपी, तो इस अवसर का साक्षी बनने के लिए कई केन्द्रीय मंत्रियों तक में होड़ लग गई थी। छात्रों के साथ अमेरिकी विश्वविद्यालय ने विशेष निमन्त्रण और बतौर स्पेशल गेस्ट तीन माह के लिए प्रो. जयेन्द्र और प्रो. नारंग को भी बुलाया।
    आज अमेरिकी विश्वविद्यालय में अपने छात्रों का आखिरी दिन था और नीलमणि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राठोर भी प्रो. सिन्हा के साथ वहां के समारोह में मौजूद थे। उनके मन में बेहद उत्साह था, कि कल जब अपने पन्द्रह होनहार भावी वैज्ञानिको के साथ वह भारत की भूमि पर लैण्ड करेगे, तो पूरा देश उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़ेगा। लेकिन यह क्या.......? समारोह के बाद सभी पन्द्रह छात्र और दोनों प्रोफेसर्स उनके पास आये, उनके चरण-स्पर्श किये और लगे आशीर्वाद मांगने, ‘सर हम सबको यहां अमेरिका में बेहद उच्च पैकेज पर काम करने का अवसर मिल गया है। आप हमें आशीर्वाद दीजिए कि हम यहां अपने देश नाम रौशन ....!’
   प्रो. राठोर को लगा जैसे वह गश खाकर गिर जायेंगे। बगल में खडे़ प्रो. सिन्हा ने  उन्हे सहारा दिया, ‘सर, सम्हालिए अपने-आपको। अब अफसोस करने से कोई फायदा नहीं, आपके सपनों के ये सत्रह फूल तो भू-मण्डल के स्वामी की भेंट चढ़ चुके हैंे।‘

 इन्टरनेट का मन्दिर
   प्रतीक बेहद निराशा की स्थिति में पापा के बेड के पास जमीन पर बैठा हुआ था। ‘साल भर ही तो हुआ है, पापा ने कितने अरमानों के साथ अपनी तमाम जमा-पूँजी लगाकर उसका दाखिला मेडीकल में करवाया था। और पापा आज स्वयं इस स्थिति में.....। कितने ही डाक्टर्स को दिखा लिया पर बीमारी का ही पता नहीं चल पा रहा है और उनकी हालत दिनोंदिन सीरियस होती जा रही है.....!’ प्रतीक की अपनी पढ़ाई तो आगे हो पाना असम्भव ही हो गया है, क्यों कि पापा के इलाज के लिए भी अब परिवार की सम्पत्तियां बेचने की नौबत आ चुकी है। ....‘हे भगवान! अब क्या करूँ.....  !’
    अचानक उसके दिमांग में एक विचार आया, क्यों न इन्टरनेट पर सर्च की जाये! मेडीकल की भाषा तो वह इस एक वर्ष में समझने ही लगा है। हो सकता है पापा की बीमारी का कोई समाधान मिल जाये! ग्लोबलाइजेशन के इस जमाने में तो हर बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान निकल आता है....!’ और प्रतीक अपना लैपटाप खोलकर इन्टरनेट पर सर्च करने बैठ गया।
   तीन-चार घंटे तक लक्षणों के आधार पर बीमारियों, विभिन्न बीमारियों के लक्षणों तथा मेडीकल केस स्टडीज आदि के सन्दर्भ में गहन खोज के बाद अचानक एक ऐसे केस का पता चला, जिसमें पैसेन्ट की बीमारी के लक्षण पापा की बीमारी से मिलते-जुलते थे। उसे यह भी पता चला कि इस पैसेन्ट का इलाज अमेरकिा के सुप्रसिद्ध डॉक्टर एबॉट ने किया था और वह इस तरह की बीमारियों पर शोध भी कर रहे हैं। प्रतीक ने अपने एक सीनियर प्रोफेसर डा. मिश्रा सर को कन्सल्ट करने के लिए फोन लगाया। डा. मिश्रा ने डा. एबॉट के बारे में बेहद उत्साहजनक जानकारी देते हुए बताया कि डा. एबॉट दिल्ली में बतौर विजिटिंग कन्सल्टेन्ट डा. शिराय के हास्पीटल में आते रहते हैं। हो सकता है उनका निकट भविष्य में भी कोई विजिट हो। डा. शिराय उनके परिचित हैं, वह थोड़ी देर में मालूम करके काल करेंगे। प्रतीक ने डा. मिश्रा को ‘थैंक्स सर’ कहकर फोन रखा तो एक आशा की किरण उसके अन्तर्मन में झांकने लगी थी। करीब आधा घंटा बाद इस अच्छी सूचना के साथ डा. मिश्रा सर का फोन आया कि डा. एबॉट परसों सुबह दिल्ली आ रहे हैं, और डा. शिराय ने उनकी रिक्वेस्ट पर उसी दिन शाम पाँच बजे का समय प्रतीक के पिता को देखने के लिए नियत करवा दिया है।
   नियत दिन और समय पर डा. एबॉट ने प्रतीक के पापा का चैक अप करके बताया- ‘इस तरह के लक्षणों वाले बहुत कम पैसेन्ट अब तक देखने में आये हैं और उनमें से एक-दो को छोड़कर कोई भी नही बचा है। दरअसल इस बीमारी के बारे में किसी पैसेन्ट पर कुछ एक्सपेरीमेन्ट जरूरी हैं, इसके लिए वह अभी तक किसी पैसेन्ट को तैयार नहीं कर पाये, अतः उनका शोध अधूरा ही है। परीक्षण पूरी तरह रिस्की है और पैसेन्ट के बचने की सम्भावना दो-चार प्रतिशत से अधिक नहीं है। आपके पैसेन्ट के बारे में भी इलाज न होने या वर्तमान सीमित नॉलेज के आधार पर इलाज किए जाने पर भी बचने की सम्भावना इससे अधिक नहीं है। और यदि आप लोग मुझे नियत परीक्षण इनके ऊपर करने की इजाजत दे दें, तब भी यही सम्भावना है। इनका बेटा मेडीकल पढ़ रहा है, वह मेरी बात को शायद समझ सके। परीक्षणों के बाद यदि बीमारी की पहचान और उसके निदान के अपने अनुमानों को कन्फर्म कर पाया, तो आपका पैसेन्ट तो बच ही जायेगा, भविष्य में इस बीमारी से अन्य लोगों को बचाना भी सम्भव हो जायेगा। न बचने की स्थिति में मैं अधिक कुछ तो नहीं कर सकता, पर कम्पन्सेशन के तौर प्रतीक की शेष पढ़ाई के व्यय के साथ कुछ और भी वित्तीय मदद आपके परिवार की करने को तैयार हूँ।’
   विदेशी डॉक्टर की बात सुनते ही प्रतीक के दादा जी क्रोध में आ गये- ‘ये विदेशी हमें समझते क्या हैं! हम यहाँ इलाज कराने आये हैं या अपने बीमार बेटे को इनकी खोज के लिए बेचने .......!’ उस वक्त हॉस्पीटल में मौजूद कुछेक पत्रकारों को पता चला, तो उन्होने भी इस मसले को ‘भारतीय बनाम विदेशी’ रंग मे रंगकर कई टी.वी. चैनलों पर प्रसारित करवा दिया। शाम होते-होते मुद्दा पूरे मीडिया में छाने लगा।
    प्रतीक ने इस पूरे मसले पर पापा के बारे में डॉक्टर एबॉट के बताए गये फैक्ट के साथ-साथ मेडीकल और सामाजिक नजरिए से सोचा, तो वह परेशान होने लगा। उसे लगा कि परीक्षण करना ही सही विकल्प है, पर दादाजी को कैसे समझाये, माँ से कैसे बात करे? काफी सोच विचार के बाद वह डाक्टर एबॉट से अकेले में मिला, और सारे प्रकरण में उनको लक्ष्य बनाये जाने पर माफी मांगते हुए परीक्षणों के लिए अपने परिवार को तैयार करने के लिए कुछ वक्त मांगा। डॉक्टर एबॉट ने इस पर सहृदयता दिखाते हुए कहा- ‘मैं समझ सकता हूँ।’
   इसके बाद प्रतीक ने साहस करके अपनी माँ और दादाजी को समझाया- ‘परीक्षण न करने पर हमें क्या हासिल होना है, पापा के बचने की सम्भावना न के बराबर है। और यदि परीक्षण के बाद उन्हें बचाया जा सका तो हमारी खुशियाँ तो लौट ही आयेंगी, हम मेडीकल साइन्स की प्रगति और समाज की भलाई में भी सहभागी बन जायेंगे ......।  इसलिए प्लीज आप अपनी सहमति दे दीजिए.....!’ कई घंटे तर्क-वितर्क चला, और अन्ततः दादाजी मान गये। अगले दिन पूरा परिवार डॉक्टर एबॉर्ट से मिला, और पिछले दिन जो कुछ हुआ, उसके लिए उनसे क्षमा मांगते हुए परीक्षण और इलाज करने का अनुरोध किया।
   सौभाग्य से परीक्षण सफल रहे। बीमारी की सही पहचान और निवारण को लेकर डॉक्टर एबॉट के अनुमान बिल्कुल सटीक निकले। पूरे मीडिया में इस प्रकरण के दूसरे और सही पक्ष की चर्चा भी पूरे देश ने देखी-सुनी। प्रतीक के पापा का इलाज सफलतापूर्वक हुआ और अगले कुछ माह में पूरी तरह ठीक हो गये।
   आज घर में खुशियों-भरा माहौल था। प्रतीक की माँ ने सभी लोगों से भगवान का धन्यवाद और दर्शन करने मन्दिर चलने का अनुरोध किया तो प्रतीक ने याद दिलाया- माँ, असली कृपा करने वाला भगवान तो इन्टरनेट है, जिसने हमें डॉ. एबॉट से मिलवाया। और इस ग्लोबल भगवान का मन्दिर यह मेरा लैपटाप है, पहले इसके आगे तो मत्था टेक लो .....! और .... यदि हम सब अपने सामाजिक नजरिए को परिवार और देश की सीमाओं से परे भी विस्तार दे पायें तो........!