Tuesday, February 25, 2020

लघुकथा की भाषा पर एक नोट

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डॉ. उमेश महादोषी

लघुकथा की सूक्ष्मताओं से भाषा के संवाद का प्रश्न

साहित्य में भाषा का आशय
      साहित्य में समग्रतः भाषा का आशय विचारों एवं भावों के सानुरूप शब्दावली से निर्मित माध्यम से होता है, जो अभिव्यक्ति को संभव बनाता है और अपनी प्रकृतिगत विशिष्टताओं से रचनात्मकता का प्रेरक एवं/अथवा उसकी अभिवृद्धि में सहायक बनने के साथ विभिन्न विधाओं के स्वभाव में भी सार्थक व सामयिक हस्तक्षेप करता है। साहित्यिक भाषा में समुचित, ग्राह्य एवं स्वीकार्य शब्दावली के उपयोग की अपेक्षा की जाती है। 
      साहित्य के सन्दर्भ में भाषा में प्रमुखतः दो चीजें होती हैं- प्रकार और प्रकृति। भाषा के प्रकार कई आधारों पर तय किए जाते हैं लेकिन अन्ततः प्रकार की दृष्टि से भाषा अभिव्यक्ति का सामान्य माध्यम होती है, उसका महत्व भी उतना ही सीमित होता है। भाषा की प्रकृति पर ध्यान दिये बिना बात किसी भी भाषा-प्रकार में कही जाये, उसका सामान्य और प्राथमिक उद्देश्य विचार और भाव का शाब्दिक सम्प्रेषण मात्र होता है। इससे इतर, भाषा की प्रकृति रचनात्मक स्तर पर व्यापक महत्व की होती है। संवेदना व संस्कारबद्धता, स्थानीय बोली, संस्कृति, स्थानीय स्तर पर प्रचलित अन्य भाषाओं, सांकेतिकता के उपयोग जैसी चीजों और भौगोलिक क्षेत्रों व जीवन के विविध स्तरों की अन्यान्य स्थानिकताओं के प्रभाव से संपृक्त होने पर एक ही प्रकार की भाषा अलग-अलग क्षेत्रों व अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग रूप में दिखाई देती है। मॉरीशस की हिन्दी भारत की हिन्दी से और बिहार की हिन्दी उ.प्र. की हिन्दी से कुछ अलग होती है। यहाँ तक कि उ.प्र. के ही अलग-अलग क्षेत्रों की हिन्दी की प्रकृति में भी अन्तर देखने को मिल जाता है। एक ही सन्दर्भ में किसी व्यक्ति की प्रतिक्रिया की भाषा अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग तरह से देखने को मिलती है। अलग स्थितियों में के सन्दर्भ में कमलेश चौरसिया की लघुकथा ‘रुदाली’ (नई सदी की धमक) और इसी विषय पर निवेदिता श्रीवास्तव की रचना ‘पेट का सवाल’ (वेब पत्रिका ‘रचनाकार’) को देखा जा सकता है। दोनों लघुकथाओं में रुदाली का काम करने वाली महिला को विलाप का न्यौता मिलता है लेकिन दोनों में अलग-अलग स्थितियाँ हैं और न्यौते पर दोनों की प्रतिक्रिया की भाषा भी अलग-अलग तरह की है।
      भाषा समाज में आने वाले सामयिक परिवर्तनों एवं अन्तर्क्षेत्रीय अधिग्रहीत तत्वों के प्रभाव से भी अछूती नहीं रह पाती। इसलिए भाषा समाज और काल सापेक्ष भी होती है। युवाओं की भाषा बुजुर्गो की भाषा से कुछ अलग हो सकती है। डॉ. बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘उजालों का मालिक’ (तैरती पत्तियाँ) में इस अन्तर को बहुत अच्छे से समझा जा सकता है। एक कालखण्ड के युवाओं की भाषा आपको दूसरे कालखण्ड के युवाओं की भाषा से अलग मिलेगी (एक सौ वर्ष बाद की भाषा का प्रक्षेपण डॉ. उमेश महादोषी की लघुकथा ‘जब समय केवल एक बिन्दु होगा’ (‘मैदान से वितान की ओर’) में वर्तमान भाषा परिदृश्य के सापेक्ष देखा जा सकता है।)। सम्पन्न वर्ग और निर्धन वर्ग की भाषा में अन्तर मिलेगा। धर्म या समुदाय विशेष की भाषा में भी दूसरे धर्म या समुदाय के सापेक्ष अन्तर मिलेंगे। 
      समाज में आने वाले सामयिक परिवर्तन भी भाषा की प्रकृति को प्रभावित करते हैं। तकनीक एवं व्यावसायिकता के दबावों से जनित परिवर्तन अनेक स्थापित जीवनमूल्यों के विपरीत जाकर भी समाज में अपने लिए स्थान बनाकर विचारों और भावों को प्रभावित करते हैं। रचनात्मक अभिव्यक्ति में इनके प्रतिबिम्बन की आवश्यकता भाषा की प्रकृति को प्रभावित करती है। सुकेश साहनी की लघुकथा ‘कसौटी’ (पड़ाव और पड़ताल खण्ड-2/साइबरमैन) में सुनन्दा के समक्ष दूसरे टैस्ट में प्रश्नों की भाषा उसे परेशान करती है। सुनन्दा अपनी भिन्न भाषाई सांस्कृतिक समझ के कारण उन प्रश्नों की भाषा पर कम्पनी की समझ के स्तर तक नहीं पहुँच पाती है।
      उपयोग के स्तर के अनुरूप भी भाषा की प्रकृति अलग-अलग होती है। अकादमिक स्तर की भाषा प्रशासनिक स्तर पर उपयोग होने वाली भाषा से अलग दिखाई देती है। रचनात्मक साहित्य की भाषा अकादमिक एवं प्रशासनिक- दोनों के स्तर की भाषा से अलग होती है। रचनात्मक साहित्य की भाषा में अलंकारिकता, बिम्ब योजना, पात्रानुकूल एवं स्थिति सापेक्ष भाषाई प्रयोगों के माध्यम से अतिरिक्त सौंदर्य बोध, रचनागत प्रभाव एवं स्वाभाविकता पैदा करने की कोशिश तो होती ही है, विधा विशेष, यहाँ तक कि रचना विशेष की अन्यान्य आवश्यकताओं के दृष्टिगत भी उसमें विविध प्रयोग किये जाते हैं। लघुकथा की भाषा को कहानी की भाषा से अलग देखा जाता है।
      प्रकृति की दृष्टि से भाषा का उद्देश्य सामान्य सम्प्रेषण मात्र नहीं होता। भाषा की प्रकृति में स्थित तत्व सामान्य सम्प्रेषण को प्रभावशाली विशिष्ट सम्प्रेषण तक ले जाते हैं। साहित्य में तो भाषा की प्रकृति में किये जाने वाले प्रयोग कुछ ऐसी विशिष्टताओं को भी सामने लाते हैं, जो रचनात्मकता की प्रेरक एवं/अथवा उसकी अभिवृद्धि में सहायक बनती हैं। 
      हम कह सकते हैं कि प्रकृति की दृष्टि से अपने प्रक्षेपित प्रभाव के साथ शब्दों, अलंकरणों, संकेतों और अधिग्रहीत तत्वों के ध्वनित और ग्राह्य अर्थ ही भाषा का वास्तविक रूप होते हैं। 

लघुकथा की भाषा
      किसी भी अन्य विधा की तरह लघुकथा की भाषा भी रचना के सृजन के प्रेरक कारकों एवं संरचनात्मक आवश्यकताओं, लेखक के रचनात्मक सरोकारों, कथ्य-सम्प्रेषण की आवश्यकताओं एवं सामाजिक परिवेश के विद्यमान यथार्थ से प्रभावित होती है। प्रत्येक स्तर पर लघुकथा की अपनी आवश्यकताएँ अन्य विधाओं से कुछ अलग होती हैं, निश्चित रूप से इन तमाम स्तरों पर लघुकथा की भाषा भी कुछ अलग तरह की होगी। लेकिन प्रत्येक रचना का आन्तरिक वातावरण होता है, भाषा की प्रकृति में उसके प्रति सानुरूपता बनाये रखकर ही उसकी स्वाभाविकता को अक्षुण्य रखा जा सकता है।
      रचना सृजन के प्रेरक कारकों को वैचारिक, दैहिक, कथा-सौंदर्य, शीर्षक और मौलिकता से सम्बन्धित पाँच स्तरों पर समझा जा सकता है। पुनः लघुकथा-सृजन की वैचारिक प्रेरणाओं को प्रेरक परिवेश, समकालीन प्रवृत्तियों, सामाजिक दायित्वबद्धता, सामयिक परिवर्तनों, विधागत स्वभाव और रचनागत व रचनात्मक चिंतन के संयुक्त प्रभाव की तरह देखा जा सकता है। लघुकथा की भाषा इन तत्वों के सानुरूप होनी चाहिए। शब्दों के ध्वन्यार्थ, सांकेतिकता, स्थानिकताओं, बिम्बों के उपयोग आदि से इन कारकों की प्रस्तुति में अनावश्यक वर्णन और आकारगत शिथिलता को नियंत्रित तथा प्रस्तुति  को सटीक, अधिक सम्प्रेषणीय एवं सौदर्यबोधक बनाया जा सकता है। विधागत स्वभाव के निर्वाह की दृष्टि से भाषा को अनुभूति की तीक्ष्णता को बढ़ाने एवं अभिव्यक्ति व सम्प्रेषण की गति को त्वरित करने में सहायक होना आवश्यक है। उसकी प्रकृति रचनागत व रचनात्मक चिंतन की दृष्टि से घटनाओं व तथ्यों की प्रस्तुति में समदृष्टा की दृष्टि, संवेदनात्मक यथार्थ सत्य की समझ और मनुष्यता व सामाजिकता के हित में रचनात्मकता के सृजन के भाव से सम्पृक्त हो।
     लघुकथा के दैहिक तत्वों से भाषा का प्रत्यक्ष और निकट सम्बन्ध होता है। भाषा की उपयुक्त प्रकृति और तात्विक संरचना कथानक की सम्पूर्णता को अक्षुण्य रखते हुए भी उसे घनीभूत बनाने में सहायक हो सकती है। विषय की स्पष्टता; घटनाओं व दृश्यों के वर्णन में संक्षिप्तता; वातावरण में संक्षिप्तता-संगतता, पात्रों व चरित्रों के वर्णन और उनके संवादों के सानुरूप होने को प्रेरित करने वाली भाषा का उपयोग लघुकथा के प्रभाव को बढ़ाता है। इसे समझने के लिए सुकेश साहनी की ‘लाफिंग क्लब’ (साइबरमैन), डॉ. बलराम अग्रवाल की ‘जोस्सी और जजमान’ (तैरती पत्तियाँ), डॉ. संध्या तिवारी की ‘सम्मोहित’ (नया ज्ञानोदय) एवं ‘254/-’ (प्रकाशनाधीन संग्रह ‘अँधेरा उबालना है’) जैसी लघुकथाएँ अच्छे उदाहरण हैं।
      लघुकथा की विश्वसनीयता एवं तार्किकता के निर्वाह में भी भाषा की सानुरूप प्रकृति का महत्वपूर्ण योगदान होता है। लघुकथा की भाषा कथ्य को स्पष्ट और तीव्रता के साथ सम्प्रेषित करने में समर्थ होनी चाहिए। समान विषयों पर लेखन को भाषागत प्रयोगों से मौलिकता का पुट भी दिया जा सकता है। लघुकथाकार भाषा में अपना वैयक्तिक प्रभाव निर्मित करके भी रचना की मौलिकता में अभिवृद्धि कर सकता है। डॉ. सतीश दुबे, भगीरथ, डॉ. बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी, संध्या तिवारी, चन्द्रेश छतलानी आदि कई लघुकथाकारों की अधिकांश लघुकथाओं की भाषा पर उनके व्यक्तित्व की छाया/वैयक्तिक विशिष्टता को देखा जा सकता है। शीर्षक के निर्माण में भी भाषा का योगदान होता है, इसलिए यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि शीर्षक में उपयोग की गई शब्दावली के ध्वन्यार्थ का विस्तार लघुकथा में और लघुकथा के कथ्य और सौंदर्य का सारांकन शीर्षक की शब्दावली में प्रतिबिम्बित हो। शीर्षक लघुकथा का वास्तविक व समग्र प्रतिनिधित्व कर सके। और शीर्षक से विकीर्णित आकर्षण के बावजूद लघुकथा स्वतन्त्र रूप मंे भी समझी जा सके।
      लघुकथा लेखक के रचनात्मक सरोकारों को ध्यान में रखकर भी लघुकथा के सृजन में भाषा का चयन व उपयोग किया जाना चाहिए। रचनात्मक सरोकारों में कथा-सौंदर्य की निर्मिति, समस्यात्मक एवं/या अनुभूतिगत परिवेश में परिवर्तनगामी दृष्टि का अन्वेषण (दृष्टि-अन्वेषण), मानवोपयोगी स्थापनाओं की तार्किकता एवं जीवनमूल्यों में विकासपरक हस्तक्षेप जैसी चीजें शामिल होती हैं। दूसरे शब्दों में  लेखक के रचनात्मक सरोकार आकर्षण, प्रक्षेपण एवं सम्प्रेषण के स्तम्भों पर खड़े होते हैं, जिन्हें भाषायी कलात्मकता एवं प्रयोगों से प्रभावकारी बनाया जा सकता है। इस सन्दर्भ में डॉ. संध्या तिवारी की लघुकथा ‘कविता’ (पड़ाव और पड़ताल खण्ड-26/अविराम साहित्यिकी, जुलाई-सितम्बर 2016) की भाषा और उसमें काव्यात्मक प्रयोग को देखा जा सकता है। बाल मनोविज्ञान से जुड़ी अशोक भाटिया की लघुकथा ‘सपना’ (अँधेरे में आँख) को भी इस सन्दर्भ में देखा जा सकता है।
      कथ्य सम्प्रेषण के सन्दर्भ में भाषा को सामान्य सम्प्रेषण (कहे गये) तक सीमित नहीं रखा जा सकता, उसे प्रभावशाली एवं विशिष्ट सम्प्रेषण (जो नहीं कहा गया) तक ले जाना होता है। इसलिए भाषा में प्रकृतिगत प्रयोगों का विशेष महत्व होता है। लघुकथाकार के लिए आवश्यक है कि वह लघुकथा की बारीकियों एवं विधागत स्वभाव के आधार पर उसकी आवश्यकताओं को समझे और संभावित रचना (लघुकथा) के वातावरण और पात्रों से जुड़ी सूक्ष्मताओं के अनुरूप भाषा का ताना-बाना बुने। डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथा ‘अ-संवाद’ (गुलाबी फूलों वाले कप) अनकहे को कह जाने का अच्छा उदाहरण है।
      लघुकथा (अन्य विधा-रचनाओं की तरह ही) की भाषा सामाजिक परिवेश के विद्यमान यथार्थ से भी प्रभावित होती है। सामाजिक परिवेश में साम्प्रदायिक विद्वेष, जातीय उन्माद, राजनैतिक दुराग्रहों एवं तज्जनित पक्षपातपूर्ण स्थितियों के साथ विभिन्न विमर्शों से उभरती अतिरेकपूर्ण स्थितियाँ भी साहित्य की भाषा में अपना सिर गड़ा देती हैं। मैं ऐसी स्थितियों को लघुकथा-सृजन के माध्यम से रचनात्मक विमर्श के दायरे में लाने से परहेज की वकालत नहीं करता किन्तु भाषा के स्तर व उद्देश्य पर उचित-अनुचित के प्रश्न को उपेक्षित नहीं किया जा सकता। विगत दिनों कुछ व्यापक महत्व की लघुकथाओं को संकुचित दायरे तक सीमित करके विवादित बनाते हुए भी देखा गया है। लघुकथा की भाषा पर ऐसे प्रभाव आने वाले समय में और गहरा सकते हैं। 
      लघुकथा में भाषा या तो पात्रों के संवादों व मनन-चिंतन के माध्यम से सामने आती है या फिर प्रस्तुतकर्ता (नरेटर) की व्याख्या व वर्णन में प्रयुक्त शब्दावली के रूप में। कभी-कभी रचना में ऐसा भी हो सकता है कि कोई पात्र उपस्थित होकर भी न तो बोले और न ही किसी गतिविधि में प्रत्यक्षतः सहभागी बने। इसके बावजूद वह बहुत कुछ कहना चाहे। कभी-कभी अनुपस्थित पात्र भी लघुकथा को प्रभावित करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में भाषा संकेतों एवं स्थितियों से प्रस्फुटित हो सकती है। 
      लघुकथा में स्वाभाविकता, जो अन्ततः उसके प्रभाव को बढ़ाती है, बनाये रखने के लिए भाषा को रचना की प्रकृति, उद्देश्य एवं वातावरण की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। पात्रों द्वारा प्रयुक्त भाषा का उनके चरित्र, परिवेश एवं योग्यतानुरूप होना भी आवश्यक है। एक अनपढ़ व्यक्ति की भाषा शिक्षित व्यक्ति से अलग होनी चाहिए। यदि लघुकथा का वातावरण और पात्र हिन्दीतर क्षेत्रों (जहाँ हिन्दी को बहुत कम समझा जाता है) से सम्बन्धित हैं और रचना को हम पूरी तरह हिन्दी की ही बनाए रखना चाहते हैं तो मूल हिन्दी के प्रयोग की बजाय हिन्दी में समझे जाने योग्य उस भाषा के शब्दों और उस क्षेत्र में प्रचलित प्रकृति की हिन्दी का प्रयोग करें, उस भाषाई क्षेत्र के सांस्कृतिक पुट का समावेश करें, पात्रों व स्थानों के नाम क्षेत्र में प्रचलित तरह के हों, तो अधिक उचित होगा। इससे एक ओर पाठक रचना-पाठ के समय रचना की स्थानीयता से जुड़ा रहेगा, दूसरी ओर रचना की विश्वसनीयता के खण्डित होने का अवसर नहीं रहेगा। कुसुम जोशी की कई लघुकथाओं में उत्तराखण्ड के पहाड़ी परिवेश और संध्या तिवारी की कई लघुकथाओं में शाहजहाँपुर (मध्य उ.प्र.) के स्थानीय परिवेश को उभारने वाले भाषा संकेतों का प्रयोग कुशलता से किया गया है। ऐसी रचनाओं का भाषा-सौंदर्य प्रभावित करता है। 
      इन तमाम चीजों के दृष्टिगत कहा जा सकता है कि भाषा में पात्र-सापेक्षता, काल-सापेक्षता, क्षेत्रीयता का पुट, काव्यात्मकता एवं प्रतीकों व बिम्बों का उपयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

लघुकथा में भाषागत प्रयोग
      लघुकथा के विधागत स्वभाव में कई चीजें शामिल हैं, जो लघुकथा की अन्य कथा विधाओं से भिन्नता की प्रेरक होती हैं। इन चीजों को और अधिक प्रभावकारी बनाने एवं कुछ नई चीजों को जोड़ने की आकांक्षा से प्रयोग किये जा सकते हैं, किये जा रहे हैं। इनमें भाषागत प्रयोग भी शामिल हैं। पात्रों और कई बार नरेटर के रूप में लेखक भी पाठकों से रूबरू होता है। भाषा के माध्यम से नाटकीयता लाने के प्रयास भी देखे गये हैं। ऐसे प्रयोग लघुकथा में सौंदर्य, नवीनता और प्रभाव पैदा करने के उद्देश्य से किये जाते हैं। इस सन्दर्भ में मधुदीप जी की कई लघुकथाएँ, विशेषतः ‘नमिता सिंह’ (मधुदीप की नमिता सिंह) व ‘समय का पहिया’ (समय का पहिया़) को देखा जा सकता है। मधुदीप जी के अधिकांश प्रयोग प्रभाव पैदा करने की दृष्टि से होते हैं। भाषाई प्रयोगों के माध्यम से पात्रों की क्षेत्रीयता, रिश्तों, चरित्र और वय सम्बन्धी पहचान को भी स्थापित किया जा सकता है। पात्रों के जीवन-वृत्त को भी भाषाई सांकेतिकता से बताने की कोशिशें (उदाहीणार्थ रवि प्रभाकर की लघुकथा ‘कुकनूस’ में) देखी गई हैं। 
      इन भाषागत प्रयोगों में कुछ सावधानियाँ अपेक्षित होती हैं। कोई भी प्रयोग स्पष्ट उद्देश्य और रचना के मूल तत्वों के सानुरूप होने पर ही सफल हो सकता है। मधुदीप की लघुकथा ‘नमिता सिंह’ में पहले और अंतिम पैराग्राफ में फिल्मी गीत के मुखड़े का प्रयोग मुख्य पात्र ‘नमिता सिंह’ के बोल्ड व्यक्तित्व की वास्तविकता को रेखांकित करने और उसके प्रभाव को बढ़ाने के स्पष्ट उद्देश्य से किया गया है। यह प्रयोग लघुकथा के वातावरण और नमिता सिंह की गतिविधियों व संवादों से ध्वनित दृष्टिकोंण और नेपथ्य से झाँकते उसके व्यक्ति-सौंदर्य के सानुरूप भी है।
      मेरा मानना है कि लघुकथा समस्या या अनुभूति केन्द्रित रचना होती है जबकि कहानी व उपन्यास नायकत्व केन्द्रित। इस बिन्दु पर लघुकथा की भाषा में विशेष सजगता अपेक्षित होती है। भाषाई असावधानी लघुकथा के प्रमुख पात्र की सक्रियता को समस्या या अनुभूति पर प्रमुखता देकर लघुकथा को कमजोर बना सकती है। जगदीश कश्यप की लघुकथा ‘साँपों के बीच’ भाषागत सजगता के कारण ही एक प्रभावशाली लघुकथा बन पाई है। कई अन्य लघुकथाओं को किसी बिन्दु विशेष पर भाषागत असावधानी के कारण लचर रचनाओं में बदलते देखा गया है। जगदीश जी की उक्त रचना में युवक रचना के बुजुर्ग पात्र के जिस सम्बोधन व अन्यों के समर्थन के कारण स्वयं को ‘साँपों की बीच’ खड़ा महसूस करता है, उसके स्थान पर बुजुर्ग और लाइन में लगे अन्य लोग मूकदर्शक बने रहते या संगठित होकर युवक का समर्थन कर देते और दबाव में आकर दुकानदार युवक को तेल दे देता तो यह एक गम्भीर भाषागत असावधानी होती, जो युवक को नायक बना सकती थी और लघुकथा अपने यथार्थ भाषाई चरित्र एवं उद्देश्य से भटककर एक लचर रचना बनकर रह जाती। 

लघुकथा में भाषा एवं भाषागत प्रयोगों का महत्व 
      जीवन से जुड़ी सूक्ष्मताओं को बड़े पर्दे पर प्रदर्शित करने की शक्ति के कारण लघुकथा एक विशिष्ट कथा विधा है, इसलिए लघुकथा रचना में सामान्य सम्प्रेषण से बात नहीं बनती। लघुकथा के कथ्य और अन्य तत्वों से जनित प्रभाव के विशिष्ट एवं तीव्र सम्प्रेषण पर फोकस करना होता है। लघुकथा की भाषा पात्रानुकूल, कालानुरूप, समयानरूप, स्थिति अनुरूप होने के साथ रचनागत उद्देश्य के अनुरूप भी होनी चाहिए। भाषा के माध्यम से लघुकथा में कथा सौंदर्य एवं सम्प्रेषण में वृद्धि की जा सकती है, कथ्य-सम्प्रेषण में तीव्रता लाई जा सकती है, शाब्दिक मितव्ययता के माध्यम से कसावट लाई जा सकती है, रचना में स्वाभाविकता एवं विश्वसनीयता का निर्वाह किया जा सकता है, पाठक-पात्र सम्बन्धों में अतिरिक्त सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया जा सकता है, व्यक्त विचारों एवं भावों के माध्यम से पाठक-लेखक के मध्य एक रिश्ता बनाया जा सकता है। यह सब चीजें लघुकथा की रचनात्मकता में शक्ति-संचार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इस सबके लिए हमें भाषा-प्रयोग के सन्दर्भ में सजग और प्रतिबद्ध होना पड़ेगा। भाषा-प्रयोग को लघुकथा-सृजन के उद्देश्य में शामिल करना होगा।

लघुकथा में भाषा की यथार्थ स्थिति
      निसन्देह लघुकथा में अनेक सुन्दर और प्रभावशाली रचनाओं का सृजन हुआ है और ऊपर जिन बातों की चर्चा की गई है, उनमें से अनेक चीजें व्यावहारिक स्तर पर मानी-समझी जाती हैं। किन्तु एक वास्तविकता यह भी है कि हिन्दी लघुकथा में भाषाई स्तर पर विद्यमान सजगता का स्तर संतोषजनक नहीं है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत में वर्तमान हिन्दी लघुकथा पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर पा रही है। यहाँ तक कि प्रवासी हिन्दी लघुकथा में भी विदेशी पृष्ठभूमि और विदेशी चिंतन की उपस्थिति उस तरह देखने को नहीं मिलती, जैसी होनी चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे हिन्दी की अधिकांश लघुकथाएँ हमारे देश के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बैठकर लिखी जा रही हों। भाषाई स्तर पर चिंतन-मनन के बाद पढ़ने पर अनेक श्रेष्ठ लघुकथाएँ भी कमजोर दिखने लग जाती हैं। निश्चित रूप से ऐसा इसलिए हो रहा है कि भाषा-प्रयोग को लघुकथा-सृजन के उद्देश्यों के साथ सम्बद्ध करना हमने अभी सीखा नहीं है।
        ऐसा भी देखा गया है कि कोई लघुकथा एक अच्छा संदेश देती है लेकिन साथ ही उसी क्षण एक गलत संदेश भी दे रही होती है। कई मित्र इसे लघुकथा के एक पक्षीय चरित्र से जोड़कर न्यायसंगत ठहराते हैं। यह ठीक स्थिति नहीं है। मेरी दृष्टि में यह लघुकथा की एक बड़ी भाषागत कमजोरी है, जो उसे असहाय और बेवश जैसी स्थिति में ढकेलती है। यदि किसी शब्द या किसी रचना के दो विपरीत ध्वन्यार्थ उभरते प्रतीत होते हैं तो उनका प्रयोग और प्रकटीकरण अतिरिक्त सजगता के साथ किया जाना चाहिए। अन्य ध्वन्यार्थों से निरपेक्ष होकर मानकर उसके एकांगी स्वरूप को सराहा नहीं जा सकता। लघुकथा बेहद सामर्थ्यवान विधा है, किसी लघुकथाकार की कमजोरी को ढकने के लिए यन्त्रों की तलाश बेमानी है।
      भाषा सम्बन्धी प्रयोगों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। कई प्रयोग निष्प्रभावी सिद्ध हुए हैं तो कई प्रयोगों से रचनाओं में जटिलता आई है। यद्यपि इस बात का समर्थन किया जा सकता है कि प्रत्येक रचना सामान्य पाठक-वर्ग के लिए नहीं होती। कुछ रचनाओं का पाठक वर्ग विशिष्ट एवं सीमित हो सकता है लेकिन यदि किए गये प्रयोगों, विशेषतः अतिरंजना एवं अतिरेक के प्रयोग को उनकी वास्तविकता में समझते हुए उनकी परिणामी स्थिति पर कोई संगठित चर्चा हो तो भाषा-प्रयोगों में परिवर्द्धन की दृष्टि से वह एक सार्थक प्रयास हो सकता है। 
      इस सीमित चर्चा में, निष्कर्षतः हमें समझना होगा कि भाषा लघुकथा और उसके कथ्य की प्रमुख संवाहक होती है। उसका लघुकथा को प्रत्येक कोंण से पाठक के दृष्टिपटल पर प्रक्षेपित और हृदयपटल पर सम्प्रेषित करने में सक्षम होना आवश्यक है। ऐसा तभी हो सकता है, जब रचना-सृजन के प्रत्येक पक्ष से भाषा और उसकी प्रकृति का सीधा और स्पष्ट संवाद हो। लघुकथा सूक्ष्म तन्तुओं से निर्मित रचना होती है, अतः उसके सभी तन्तुओं को समझना और उनके प्रति भाषा-संवाद को रचना में उतारना थोड़ा मुश्किल किन्तु बेहद जरूरी कार्य है। लघुकथा इसके सम्पन्न होने की प्रतीक्षा में है।
  • वर्तमान संपर्क : 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र. / मोबाइल : 09458929004

Sunday, July 14, 2019

एक रिश्ता यह भी / उमेश महादोषी

      ‘‘सुनो, छत पर जा रहे हो?’’ सुबह-सुबह मुझे जीने की तरफ जाते देख किचन में काम कर रही पत्नी ने टोका।  
      ‘‘नहीं यार! मैं तो सीढ़ियाँ चढ़ने-उतरने की एक्सरसाइज करने जा रहा हूँ।’’
      ‘‘जीने पर चढ़ ही रहे हो तो दरवाजा खोलकर दो मिनट पौधों को भी देखते आना।‘‘
      ‘‘पौधों का क्या देखना? पानी तो तुमने कल ही दिया था, इतनी सर्दी में रोज-रोज तो पानी दिया नहीं जाता।’’ मैं आधी से अधिक सीढ़ियाँ चढ़ चुका था।
      ‘‘कोई मेहनत का काम नहीं बता रही हूँ। पौधों को देखने-भर के लिए कहा है मैंने।’’
      ‘‘भई, जब गमलों में कुछ काम नहीं करवाना है तो पौधों को देखने के लिए कहने का क्या मतलब?’’ छत में खुलने वाले दरवाजे के पास पहुँचते हुए मैंने सवाल किया।
      ‘‘तुम तो ऐसे सवाल कर रहे हो जैसे मैंने सवा सौ किलो वजन उठाने को कह दिया हो!’’ अब तक पत्नी के स्वर में थोड़ा गुस्सा, थोड़ी नाराजगी का भाव आ चुका था।
      ‘‘बात सवा सौ या सवा किलो वजन की नहीं है। बात का लॉजिक भी तो होना चाहिए।’’ छत का दरवाजा खोलने के बाद नीचे की ओर लॉबी में झाँकते हुए मैंने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया।
      ‘‘हाँ, हाँ! मैं तो हमेशा बिना लॉजिक की बातें ही करती रहती हूँ! लोग तो हरे-भरे पौधों को, फूलों को देखने के लिए तरसते हैं और एक तुम हो...! मैंने मरे पौधों को जिला दिया, आज छत पर हरियाली ही हरियाली दिख रही है, सुन्दर-सुन्दर फूल खिल रहे हैं, तुम्हें उन्हें देखने के लिए भी लॉजिक चाहिए?’’ पत्नी भी अब तक सीढ़ियों के पास आकर मैदान सम्हाल चुकी थी।
      ‘‘भाई साहब, भाभीजी ठीक कह रही हैं। सुबह-सुबह इन गमलों की हरियाली देखोगे तो आपका मन तो प्रसन्न होगा ही भाभीजी के साथ गमलों में लगे इन पौधों को भी अच्छा लगेगा।’’ ये हमारे पड़ौस वाली भाभीजी थीं, जो धुले कपड़े सूखने के लिए अपनी छत पर डालने आई थी और हमारी बातें बड़े चाव से सुन रही थीं।
      ‘‘बाकी तो सब ठीक है भाभीजी, पर ये पौधों को अच्छा लगने वाली बात आपने खूब कही।’’ मेरा ध्यान अब भाभीजी की ओर था।
      ‘‘भाई साहब, आप इसे मजाक मत समझिए। जैसे हमारे बच्चे हमें अपने साथ इन्वॉल्व होते देख खुश होते हैं, वैसे ही पौधे भी खुश होते हैं। आप लोग जब एक माह के लिए यहाँ नहीं थे तो मेरे द्वारा पानी देने के बावजूद इनमें से अधिकांश सूख गए थे। केवल पानी और निराई-गुड़ाई से कुछ नहीं होता, भाभीजी के हाथों का प्यार-भरा स्पर्श पाकर ये फिर से हरे-भरे हुए हैं। देखिए न, कैसे खिल रहे हैं! आप इनकी सुन्दरता को निहारेंगे, इनके बारे में कुछ कहेंगे तो ये भी खुश होंगे। भाभीजी इनके साथ बहुत मेहनत करती हैं, आप एकाद बार दो-चार मिनट के लिए इन्हें देख जाया करेंगे तो इन्हे भी लगेगा कि इनके सिर पर हाथ रखने वाला इनका भी कोई पिता है।’’
      ‘‘अरे छोड़िए भी भाभीजी, इनकी समझ में कहाँ आयेंगी ये बातें!’’ छत पर आ चुकी पत्नी का चेहरा लॉजिकल समर्थन पाकर प्रसन्नता से दमक रहा था।
      मैं कभी पौधों को तो कभी भाभीजी को देख रहा था।

Wednesday, April 4, 2018

राम का लंकादहन/उमेश महादोषी

{राजनैतिक वातावरण से जुड़े लेखन के सन्दर्भ में आज के समय में किसी रचनाकार पर इधर का या उधर का होने का आरोप बहुत आसानी से लगाया जा सकता है और ऐसे सृजन की प्रभावोत्पादकता भी कुछ दायरों को तोड़ पाने में असफल ही रहेगी। इसके बावजूद तमाम आरोपों और आलोचनाओं की संभावनाओं से भरे जटिल वातावरण में भी मुझे अपनी समझ और चिंतन के अनुसार अपने दायित्व को (भागने की बजाय) समझना जरूरी लगता है। हाँ, ऐसे समय में, किसी की दृष्टि में हम सफल हैं या असफल, इस प्रश्न को पीठ पर लादकर चलना मैं जरूरी नहीं मानता। 
तो प्रस्तुत है रचना ‘राम का लंकादहन'}


      कामरेड वंशीधर शर्मा बेड पर बैठेे टी.वी. पर आ रहे समाचार देख रहे थे। एक ओर मन के कोनों में व्याप्त बेचैनी उनके चेहरे तक आवाजाही कर रही थी तो दूसरी ओर वे खुश भी थे, चलो इस सरकार के खिलाफ कुछ तो हुआ...!
       तभी उन समाचारों का शोरगुल सुनकर कामरेड शर्माजी का दस वर्षीय पोता पढ़ना छोड़कर बराबर वाले कमरे से आकर टी.वी. के सामने खड़ा हो गया। ‘‘दादाजी, ये क्या दिखा रहे हैं टी.वी. वाले?’’
      ‘‘बेटा, हमारे शहर सहित देश के कई शहरों में दलित भाई अपने अधिकारों की रक्षा के लिए भारत बन्द का आयोजन कर रहे हैं। उसी के लाइव समाचार हैं।’’
      ‘‘ये दलित कौन होते हैं, दादाजी?’’
      ‘‘बेटा, जिनके अधिकार ताकतवर लोगों ने छीन लिए हैं और जिन्हें सताया और अपमानित किया जा रहा है, वे लोग दलित हैं।’’
      ‘‘दादा जी, लेकिन ये लोग तो दुकानों, बसों, कारों में आग लगा रहे हैं। क्या अधिकारों की रक्षा ऐसे.... अरे...देखिए दादाजी इन्होंने वो उस आदमी को जिन्दा जला दिया... वो तो मर जायेगा...’’
      ‘‘बेटा, ये छोटी-मोटी घटनाएँ ऐसे में होती रहती हैं, आप जाओ अपने कमरे में, जाकर अपना मन पढ़ाई में लगाओ।’’ 
      ‘‘अरे... दादाजी... वो देखो, पुलिस वाले को भी जला दिया इन्होंने तो? ....और वो ... वो देखो दादाजी, वो उस वैन को... उसमें बैठे लोगों सहित जला डाला... दादाजी कुछ करो...’’ पोता दादाजी की बात को अनसुना करता हुआ वीभत्स दृश्यों को देखकर घबराहट के साथ कुछ उत्तेजना में आने लगा था।
      ‘‘...आपने सुना नहीं बेटा, मैंने क्या कहा...’’
      ‘‘अरे दादाजी, वो तो मेरा दोस्त रवि गुप्ता है... ये लोग तो पल्लवपुरम तक भी पहुँच गये... दादाजी देखो रवि को पकड़ लिया उन्होंने... उसे नहला दिया किसी चीज से... अरे उन्होंने तो रवि के शरीर में आग भी लगा दी... दादाजी प्लीज बचा लो मेरे दोस्त को... कुछ करो दादाजी... हा...हा... मेरा सबसे प्यारा दोस्त...! ...दादाजी ये लोग दलित नहीं हो सकते, ये तो राक्षस हैं, रामायण वाले राक्षस... जो इन्सानों को मार देते हैं... मैं इन सबको मारूँगा दादाजी... मैं सभी को मार डालूँगा... जैसे रामजी ने राक्षसों को...’’
      कामरेड शर्मा जी ने पोते को पकड़कर अपने सीने से लगाना चाहा, लेकिन वह पूरी ताकत से छिटक गया। उसकी दृष्टि सामने दीवार में बनी खुली आलमारी में रखी दादाजी की पिस्तौल पर पड़ी, उसने पिस्तौल उठा ली...
      इससे पहले कि कामरेड शर्माजी, बच्चे को नियंत्रित करके उससे पिस्तौल छीन पाते, गोली चल गई और टी.वी. स्क्रीन को पार करती हुई निकल गई। बच्चा आक्रोश और भय से बेहोश होकर फर्श पर गिर पड़ा।
      दादाजी, कभी फर्श पर गिरे पोते को देखते तो कभी टी.वी. की बॉडी से उठती लपटों को...!

सरकार-सरकार/उमेश महादोषी

{राजनैतिक वातावरण से जुड़े लेखन के सन्दर्भ में आज के समय में किसी रचनाकार पर इधर का या उधर का होने का आरोप बहुत आसानी से लगाया जा सकता है और ऐसे सृजन की प्रभावोत्पादकता भी कुछ दायरों को तोड़ पाने में असफल ही रहेगी। इसके बावजूद तमाम आरोपों और आलोचनाओं की संभावनाओं से भरे जटिल वातावरण में भी मुझे अपनी समझ और चिंतन के अनुसार अपने दायित्व को (भागने की बजाय) समझना जरूरी लगता है। हाँ, ऐसे समय में, किसी की दृष्टि में हम सफल हैं या असफल, इस प्रश्न को पीठ पर लादकर चलना मैं जरूरी नहीं मानता।
तो प्रस्तुत है रचना ‘सरकार-सरकार’}


      नगर का चौतरफा भ्रमण करते हुए सभास्थल पर पहुँचने तक उनका चेहरा लटक चुका था। उन्होंने अपने पी.ए., जिसे वे प्यार से ‘बिछौना’ कहते थे, को तलब किया और गुप्त मंत्रणा के लिए एक कमरे में बन्द हो गये।
      ‘‘बिछौना, क्या है यह सब?’’
      ‘‘सर, मैं कुछ समझा नहीं?’’
      ‘‘भई, इस नगर के चारों ओर जो कंकालों के ढेर लगे थे। कहाँ गये वे सब?’’
      ‘‘सर, वे सब तो नए मुख्यमंत्री ने हटवाकर डिस्पोज करवा दिए। एक तरह से, सर अच्छा ही हुआ। यदि किसी पत्रकार या नई सरकार की पार्टी के किसी प्रवक्ता का ध्यान कंकालों के उन ढेरों पर चला जाता तो जवाब तो अपन लोगों को ही देना पड़ता। सर, आखिर इनके लिए जिम्मेवार तो दस साल सत्ता में रही हमारी पार्टी की ही...’’
      ‘‘कहीं तुम इस बाबा से मिल तो नहीं गए हो, जो ऐसी बहकी हुई बात कर रहे हो? हमारी पार्टी कैसे जिम्मेवार होती? ये सब तो उन्हीं अधिकारियों का किया धरा था, जो इस साधु की सरकार के लिए भी काम कर रहे हैं। मैं आसानी से उन कंकालों का ठीकरा इस सरकार के सिर पर फोड़ सकता था। आज मैंने अपना पूरा भाषण इसी को ध्यान में रखकर तैयार किया था पर यहाँ तो सूपड़ा साफ है। ...लेकिन इस साधू बाबा ने बिना किसी शोर-सराबे के इन कंकालों को हटवाया क्यों? क्या इनकी बदबू राजधानी तक पहुँचने लगी थी!’’
      ‘‘सर, बाबा का भी यही कहना था कि इन कंकालों के लिए मुख्यतः अधिकारी लोग जिम्मेवार होते हैं। लेकिन राजनीतिज्ञों की पारस्परिक प्रतिस्पर्धा का लाभ उठाकर ठीकरा उनके और अपने पूर्ववर्ती अधिकारियों के ऊपर फोड़ते रहते हैं। इसलिए एक बार सफाई जरूरी है, इसके बाद प्रत्येक अधिकारी के कार्यकाल को कंकाल की उपस्थिति की दृष्टि से भी परखा जायेगा और उनकी जवाबदेही तय की जायेगी।’’
      ‘‘हूँ...ऽ..., तो ये मुख्यमंत्री कुछ ज्यादा ही तेज है!....चलो कोई बात नहीं...हम भी तो उसके बड़े भाई....।’’
      
      और अगले दिन, नेताजी के तीखे भाषण की रिपोर्टिंग मीडिया में छाई हुई थी, ‘‘मौजूदा सरकार कंकालों में उलझी हुई है। अधिकारी कंकाल तैयार कर रहे हैं और सरकार उन्हें डिस्पोज करने में लगी है ताकि उसके अधिकारियों और मंत्रियों के काले कारनामे जनता के सामने न आ सकें, उनका कोई सबूत न बन सके। हमने अपनी सरकार के दौरान पूरी पारदर्शिता बरती थी। किसी अधिकारी के कारनामे पर पर्दा नहीं डाला था, कोई सबूत नहीं मिटाया था। नई सरकार को अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए थी, लेकिन सरकार ने तो सबूत ही मिटा दिए। ये जनता की कैसी सरकार है, देखना अपना कार्यकाल पूरा करते हुए ये पूरी जनता को कंकालों में बदलकर डिस्पो....।’’

Tuesday, October 3, 2017

जब समय केवल एक बिन्दु होगा / उमेश महादोषी


         लोगों से खचाखच भरे हॉल की बायीं साइड में खड़े मॉन्गलम की दृष्टि डायस पर बैठी उन तीन महिलाओं में से मध्य में विराजमान महिला के दीप्तिमान चेहरे पर टिकी हुई थी। तभी शिवॉय उसके पास आया और उसी साइड के मध्य गेट के बाहर ले गया। बाहर से ही वे दोनों आयोजन को देखने-सुनने लगे। लेकिन मॉन्गलम की दृष्टि उस महिला के चेहरे से हट नहीं रहीे थी। कार्यक्रम के संचालक ने तमाम अतिथियों को एक-एक कर डायस पर आमंत्रित करते समय उसका परिचय लिटरेरी स्माइल एरोज संस्था की अब तक की यंगेस्ट चेयरपर्सन के रूप में देते हुए उसका नाम मधु शि क्रॉय बताया था। शिवॉय ने उस क्षण मॉन्गलम का कन्धा दबाया, जिसका उसने कोई नोटिस नहीं लिया। मॉन्गलम को मिस क्राय के चेहरे में खोया देखकर शिवॉय भी झीनी-झीनी मुस्कान के साथ उसकी मनःस्थिति को एन्ज्वॉय करता रहा, बोला कुछ नहीं।
      ‘‘डियर शिवॉय, क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस आकर्षक महिला मधु शि क्रॉय का चेहरा मिनी टिनॉज, जो कल तुम्हारे साथ डेट पर थी, से मैच हो रहा है।’’
      ‘‘ओ मॉय यंग फ्रेन्ड! इससे क्या फर्क पड़ता है! तुम तो क्रॉय को एन्ज्वॉय करो बस!’’
      ‘‘फर्क पड़ता है डियर शिवॉय! यदि तुम्हारी मिनी से इसका कोई सीधा कनेक्शन हो तो वह क्रॉय से मेरी डेटिंग कराने में मदद कर सकती है। हिन्दोस्तान में अभी-भी इतना तो चलता ही है!’’
      ‘‘तुम सोच तो ठीक रहे हो, मॉन्गलम! मैं जरूर तुम्हारी मदद करने के लिए मिनी को तैयार करूँगा।’’
      ‘‘इसका मीनिंग हुआ, उसका इससे कोई कनेक्शन है?’’
      ‘‘हाँ, मिनी ने बताया है मुझे कि उसको क्रॉय ने अपने सेकेन्ड ‘लिव इन ब्याय’ से जन्म दिया था। और यह भी कि आजकल क्रॉय उसके पड़ोस में ही रहती है और पिछले एक वर्ष से अकेली है।’’
      ‘‘ओह! इट मीन्स, इन ओल्डर सेन्स, मिनी इज दा डॉटर ऑव दिस हैंडसम क्रॉय!’’
      ‘‘ओह! शिट् यार!! इस तरह इतिहास में घुसोगे तो तुम डेट पर एन्ज्वॉय कैसे करेागे?’’
      ‘‘ह्वाट! क्या प्राब्लेम है इसमें?’’
      ‘‘क्योंकि उस सेन्स में तुम भी क्रॉय के बेटे हो जाओगे!’’
      ‘‘हाउ..ऽ..?...?? क्या कह रहे हो तुम...?’’ मॉन्गलम बुरी तरह चौंक पड़ा।
      ‘‘यही सच है, डियर! क्रॉय का पहला ‘लिव इन ब्याय’ मैं और मेरी पहली ‘लिव इन गर्ल’ क्रॉय थी। अब से करीब वाईस वर्ष पूर्व हम दोनों दो वर्ष साथ रहे। खूब एन्ज्वॉय किया। उसी बीच तुम दुनिया में आये। हम दोनों ने एग्रीमेंट के मुताबिक चाइल्ड केयर हॉस्टल को अपने-अपने हिस्से के पच्चीस-पच्चीस लाख रूपये डोनेट करके तुम्हारी देखभाल की व्यवस्था की और अलग हो गये।’’
      ‘‘वाह! हाउ मच इन्ट्रेस्टिंग दिस!! डियर शिवॉय, इट मीन, यू आर माय डैड! ...डैड!! ...डैड!!!’’ उमंग से उछलता हुआ-सा मॉन्गलम शिवॉय को अपनी बाहों में भींचने ही वाला था कि लोगों की शिकायती नजरों का आभास होने के कारण अपने को नियंत्रित किया!
      शिवॉय ने भी उसे एक तरफ खींचते हुए नसीहत दी- ‘‘जरा धीमे बात करो और खुद को कन्ट्रोल में रखो। और हाँ, तुम इस तरह इतिहास में नहीं खो सकते मॉन्गलम! आज समय एक फैला हुआ प्लॉट नहीं, केवल एक बिन्दु है, जिसे हम अपने तरीके से एन्ज्वॉय करते हैं।’’
      ‘‘तुम ठीक कहते हो शिवॉय! लेकिन इस समय बिन्दु पर मेरे लिए यह जानना बेहद इन्ट्रेस्टिंग और एक्साइटिंग होगा कि क्रॉय  मॉम के रूप में और तुम डैड के रूप में एक साथ मेरे प्रति कैसे वीहैव करते हो! मेरे अन्दर यह जानने की बेचैनी हो रही है कि सौ वर्ष पूर्व, जब समय एक फैला हुआ प्लॉट होता था, मॉम-डैड के साथ होने पर एक सन को कैसा लगता था!’’

Monday, March 7, 2016

करे तो क्या करे भर्तुआ! / उमेश महादोषी

     उसने कल पूरे गाँव में घूम-घूमकर घोषणा की थी- ‘‘कल दोपहर तीन बजे मैं पड़ोसी कस्बे के गाँधी चौक पर सरेआम आत्महत्या करूँगा।’’ लोग पहले तो उसे आश्चर्यचकित से देखते रहे। फिर यह सोचकर कि शायद भर्तुआ का दिमांग चल गया है, बच्चे, जवान, बूढ़े- सभी तालियाँ पीट-पीटकर अपना और सबका मनोरंजन करने लगे।
     भर्तुआ अपनी आत्महत्या की घोषणा कस्बे में मौजूद सभी अखबारों के दफ्तरों के सामने खड़ा हो-होकर भी कर आया था। अखबार वालों ने उसे बाबला समझकर टाल दिया।
     उसने अपनी घोषणा को थाने एवं आसपास की पुलिस चौकियों के सामने खड़े हो-होकर भी ऊँची आवाज में दोहराया था। ‘‘हाँ.... हाँ.... जरूर करना कल आत्महत्या.... अभी यहाँ से जा!’’ कहते हुए पुलिस वालों ने भी जमीन पर डंडा फटकारते हुए उसे पागल मानकर भगा दिया था।
     एस.डी.एम., तहसीलदार, राजनैतिक दलों, पक्ष-विपक्ष के जन-प्रतिनिधियों के दफ्तरों-आवासों के सामने भी खड़ा हो-होकर उसका चीखना व्यर्थ गया। सभी ने उसे अर्द्धविक्षिप्त या पागल ही करार दिया। हँसे, तालियाँ पीटीं और अपने-अपने काम में लग गये।
     लेकिन भर्तुआ न बाबला था, न अर्द्धविक्षिप्त, न पागल! न ही कोई मनोरंजन करने के लिए पीटे जाने वाला ढोल! इसलिए वह आज नियत समय पर गाँधी चौक पर आ गया था। उसने कहीं से काफी सारी सूखी झाड़ियाँ लाकर उनसे बीच चौक पर स्थित गाँधी बाबा की मूर्ति के ढाई-तीन मीटर की परिधि में घेरा डाल दिया था। उसके पास पांच लीटर वाला एक डिब्बा था, केरोसीन से भरा हुआ। उसकी जेब में माचिस थी तीलियों से ठसाठुस। उसकी गतिविधियों को संदिग्ध मानकर आने-जाने वालों में से जब तक किसी ने पुलिस और अखबार वालों को सूचना दी और दस-बीस तमाशबीन, पुलिसिए, और अखबारिए वहाँ इकट्ठा हुए, तब तक वह झाड़ियों पर केरोसीन का छिड़काव कर चुका था। माचिस जेब से निकालकर उसने गाँधी बाबा के सिर पर रख दी थी। खुद गाँधी बाबा की लाठी से सटकर खड़ा हो गया था। बचे कैरासीन का खुले मुँह का डिब्बा उसके हाथ में था।
     एक-दो पुलिस वालों और दो-तीन तमाशबीनों ने उसे पकड़ने के लिए जैसे ही घेरे को लांघने की कोशिश की, उसने फुर्ती से माचिस उठाकर एक तीली जलाई और झाड़ियों पर फेंक दी। ‘‘कोई मेरे पास नहीं आयेगा। तुम लोगों ने कोशिश की तो मैं आगे बिना कुछ कहे-सुने ही खुद पर भी केरोसीन डालकर....’’ 
     वह कुछ कहना चाहता है, समझकर उसे पकड़ने के लिए उठे कदम उसे सुनने को ठिठक गए। ’’...मैं कल से आत्महत्या करने की घोषणा कर रहा हूँ। किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि मैं क्यों ऐसा करना चाहता हूँ। अब मुझे मर जाने दो, मेरे मरने के बाद मेरी लाश के चारों ओर इकटठे होकर तुम लोग खूब हँसना, तालियाँ बजाना, इस देश और पूरे समाज को बाबला, अर्द्धविक्षिप्त, पागल कहने वाले नारे लगाना.... कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा। अधिक से अधिक कोर्ट थोड़ी सी आँखें तरेरेगा, सरकार उसके सामने खड़ी होकर दुम हिलायेगी, विपक्ष वोटों के लिए लार टपकायेगा!... और तुम... तुम सब अपने-अपने मन में कुछ दिन कबड्डी खेलना।...’’
     उसकी बात में तिलमिलाहट थी, आक्रोश था, तंज था। कुछ युवकों, एक दरोगा और सत्ता पक्ष के एक जनप्रतिनिधि ने उससे पूछा- चलो हमसे गलती हुई, हम तुम्हारी बात को ठीक से समझ नहीं पाये। लेकिन अब तो बताओ तुम्हारी समस्या क्या है? तुम चाहते क्या हो?’’
     ‘‘...बहुत खूब! जानना चाहते हो मैं क्या चाहता हूँ...मेरी समस्या क्या है... अरे तुम लोगों को तो उस रमुआ सिंह को टी.वी. पर देखने-दिखाने से फुर्सत हो तब न? जो देश को तोड़ने की कसमें सरेआम खा रहा है, जो समाज और देश की बरबादी की बात कर रहा है, उसे बचाना जरूरी है क्योंकि वह गरीब है! वाह! क्या कनेक्शन है- गरीबी और रमुआ सिंह में! लेकिन वह गरीब है तो मैं क्या हूँ? उस पर करोड़ों बरस रहे हैं, मुझ पर बरसाने के लिए तुममें से किसी की जेब में फूटी कौड़ी भी है? उसके परिवार की जिस गरीबी को तुम टी.वी. पर देख-दिखा रहे हो, उसके चलते वह देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ सकता है, उसके चलते वह देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय के सबसे बड़े पद का चुनाव लड़ सकता है, जीत सकता है! बड़ा नेता बन सकता है! वैसी ही गरीबी के चलते मेरा बेटा क्यों दसवीं भी नहीं कर पाता? मेरे बेटे को क्यों परीक्षा में बैठने से रोक दिया जाता है? जिस गरीबी के चलते रमुआसिंह बढ़िया गाड़ियों में चलता है, वैसी ही गरीबी के चलते मेरा बेटा क्यों टूटी साइकिल तक हासिल नहीं कर पाता? देश की बरबादी और देश के दुश्मनों का साथ देने की कसमें खाने वाले रमुआ सिंह को रातोंरात कोर्ट में जमानत मिल जाती है। लेकिन मेरे बेटे को एक सिपाही के द्वारा बिना बात थप्पड़ मारे जाने पर उसका हाथ पकड़ लेने के जुर्म में तीन साल जेल में काटने पड़ जाते हैं, क्यों? मेरे फत्तुआ पर कोर्ट रहम नहीं खाता, क्यों? रमुआ सिंह के साथ देश द्रोह के बावजूद आज देश के सारे विपक्षी दल खड़े हो जाते हैं, मीडिया खड़ा हो जाता है, बड़े-बड़े बुद्धिजीवी खड़े हो जाते हैं, मेरे बेटे के साथ कोई क्यों नहीं खड़ा होता? रमुआ सिंह को गरीब कहकर, गरीबों की लड़ाई लड़ने वाला कहकर जो लोग महिमामण्डित करते हैं, वही लोग प्रदेश की सरकार में रहकर मेरे फत्तुआ को सिपाही का सिर्फ हाथ पकड़-भर लेने से अपराधी घोषित कर देते हैं, क्यों? रमुआ सिंह जो चाहता, खाता है, पीता है, भयंकर अपराध के बावजूद, उसे बड़ी-बड़ी सुविधाएँ मिलती हैं। सीधे-सीधे पुलिस उस पर हाथ नहीं डाल सकती। मेरा फत्तुआ आज ठीक से न कुछ खाता है, न पीता है, गुमसुम-सा पड़ा रहता है। उसका जीवन बर्वाद हो चुका है, कोई है पूछने वाला। पक्ष-विपक्ष, मीडिया, प्रशासन, नेता-अभिनेता, सब के सब क्यों नपुंसक बन गये हैं? सबने क्योें चुप्पी साध रखी है?....’’ कहते-कहते भर्तुआ बेहोश सा होकर गिर पड़ा जमीन पर! 
     कुछ नवयुवकों ने उसकी ओर बढ़ रही आग की लपटों से बचाने के लिए जलती हुई सूखी झाड़ियों को इधर-उधर करके भर्तुआ को बाहर निकाला।
     शाम को लोगों के साथ भतुआ ने भी टी.वी. पर देखा कि रमुआ सिंह और राज्य के सरकारी दल के नेता, जिनके शासन ने भर्तुआ के बेटे को अपराधी घोषित कर रखा था, केन्द्र सरकार के खिलाफ भर्तुआ की इस स्थिति के लिए अपनी भड़ास निकाल रहे थे। भर्तुआ की बेचैनी बड़ने लगी। क्या करे वह... उसे लोगों ने मरने नहीं दिया... जिन लोगों ने उसकी गरीबी को छीन लिया... वही अब उसकी आवाज को भी छीन रहे हैं... वह पागलों की तरह अपने घर में इधर-उधर घूमने लगा। अचानक उसके हाथ आटे की मटकी आ लगी। उसने मटकी को दोनों हाथों से उठाया और आंगन की धरती पर जोर से पटक दिया। घर के बाहर उस पर निगाह रखने के लिए लगाये गए सिपाही और दो-तीन पड़ोसियों ने मटकी के फूटने की आवाज पर अन्दर आकर देखा-  दो मुट्ठी आटा पूरे आँगन में सफेद झूठ-सा बिखरा पड़ा है!

Saturday, February 27, 2016

तीन लघुकथाएँ / उमेश महादोषी

01. उस खतरनाक मोड़ पर
     प्रधानमंत्री अपने शयनकक्ष में बिस्तर पर लेटे हुए मोबाइल पर आये संदेशों पर दृष्टि डाल रहे थे। किसी ने उन्हें एक साहित्यिक चिट्ठे का लिंक भेजा था। लिंक पर क्लिक करते ही एक गुमनाम से लेखक की तीन-चार लघुकथाएं उनके सामने थीं। शीर्षकों के आकर्षण ने उन्हें पढ़ने को विवश कर दिया। पढ़ना शुरू किया तो पढ़ते ही चले गये। उन्हें लगा जैसे तमाम उत्साह और ऊर्जा के बावजूद वे शक्तिहीन हो गए हैं। वह विवशताओं के दलदल में फंसे हुए खड़े हैं। प्रधानमंत्री चिंता में डूबने लगे। डूबते ही गये। मानसिक थकावट ने हावी होकर उन्हें कब नींद के हिंडोले में झुला दिया, पता ही नहीं चला। 
     नींद में भी अचेतन मन को चिंताओं के चक्रवात मथने लगे। देश के अच्छे खासे माहौल में अचानक उठी लपटें उन्हें बेचैन करने लगीं। एक ओर जहाँ मुनाफाखोरी, कालाबाजारी और काले धन के जहर से बढ़ती महँगाई, दूसरी ओर छोटी-छोटी बातों को लेकर साम्प्रदायिक उन्माद फैलाते विरोधी नागों की तरह फन फैलाए खड़े नज़र आये। महँगाई और भ्रष्टाचार को नियन्त्रित करने के लिए उनके कदमों में तानाशाही एवं शक्ति के केन्द्रीकरण को देखा जाने लगा। आरोपों के बहाने घटिया आलोचना से आ रहा विचलन काँटे सा चुभने लगा। इस आलोचना में कहीं न कहीं उनकी पार्टी के लोगों को उनके रास्ते के विरुद्ध उकसाने की कार्यवाही भी शामिल दिखाई दी। जनता और कार्यकर्ताओं में फैलाया जा रहा यह भ्रम, गोया सत्ता के अनेक केन्द्र होने जरूरी हैं और यह प्रधानमंत्री अपने इर्द-गिर्द केवल एक ही केन्द्र स्थापित कर रहा, एक खतरनाक भेड़िए की तरह मुँह फैलाए दिखाई दिया। सत्ता के अनेक केन्द्रों के कारण फैलने वाले भ्रष्टाचार को देख चुकने के बावजूद जनता का एक वर्ग केन्द्रीय सत्ता के एक केन्द्र पर विश्वास से डिग रहा था। पार्टी के कई नेता भी प्रधानमंत्री में खोट देखते प्रतीत हुए। साहित्यकारों-कलाकारों का एक वर्ग विपक्षियों के हाथों का खिलौना बना आतंकी बाज की तरह उनके शान्ति और विकास के प्रयासों के कबूतर पर झपटता दिखा....। उन्हें यह जानकर बेहद आश्चर्य हुआ कि आतंकवाद के खिलाफ उनकी मुहिम से सबसे अधिक देश के ही कुछ विपक्षी नेता और तथाकथित बुद्धिजीवी विचलित हो रहे हैं।
     अचानक प्रधानमंत्री बड़बड़ाते-से उठे तो किसी मन्दिर के लाउडस्पीकर से आ रही दुर्गा चालीसा की पंक्तियाँ कानों में पड़ती-सी सुनाई दीं- 
शक्ति रूप को मरमु न पायो।
शक्ति गई तब मन पछतायो।।
     वह थोड़ी देर नार्मल होने के लिए बिस्तर में बैठे रहे। रात भर अचेतन मन को मथते रहे तमाम दृश्य आँखों के सामने तेजी से घूमने लगे, उतनी ही तेजी से दुर्गा चालीसा की पंक्तियाँ कानों में रह-रहकर टकराने लगी। बेचैनी बढ़ती गई...बढ़ती गई। अचानक वह उठकर खड़े हो गये। ओढ़ी हुई चादर का एक कोना उनके एक हाथ की उँगलियों की पकड़ में था और दूसरा कोना दूसरे हाथ की उँगलियों की। अचानक उन्होंने दोनों कोनों को पूरी ताकत से विपरीत दिशा में खींच दिया, चादर बीच में से फटती चली गई। फैली हुई बाँहों से चादर के दोनों टुकड़ों को विपरीत दिशाओं में फेंका और सीने को फुलाते हुए तेज कदमों से चलते हुए बैडरूम से निकलकर लिविंग हॉल में आकर एक निर्णायक मुद्रा में खड़े हो गए। उनकी आँखें लगातार फैल रही थीं और उनसे अजीब किस्म का तेज निकलकर त्वरित गति से वातावरण में समाहित हो रहा था।


02- देश डांवाडोल धुरी पर घूम रहा है
     ‘‘आ गए दीपक बाबू! इतना लम्बा अवकाश तो आपने पहले कभी नहीं लिया, क्या किसी विशेष यात्रा पर गए थे? बहुत थके-थके से लग रहे हैं?’’
     ‘‘आप तो जानते हैं सर, मैं अवकाश लेता ही नहीं हूँ। ये छुट्टियाँ तो मजबूरी में लेनी पड़ी। लेकिन मैं बहुत निराश हूँ!’’
     ‘‘मैं कुछ समझा नहीं? छुट्टियाँ, मजबूरी, निराशा? क्या है यह सब?’’
     ‘‘देश में पाकिस्तानी ग़ज़ल गायक शराफत अली के आने का शोर-शराबा तो सुनते ही रहे हैं, सर...’’
     ‘‘मुझे सब मालूम है, दीपक! पर लगता है, कुछ बातें तुम्हारी समझ में नहीं आतीं। .... दीपक,  देश की सर्वाेच्च सुरक्षा जाँच एजेन्सी का हिस्सा जरूर हैं हम लोग, लेकिन हमें अपने दायरे एक सीमा से अधिक बनाने की आजादी नहीं है। देश और अपने समाज की विविधता से जुड़ी कई चीजों के मद्देनजर हमें सावधानी से कदम रखने पड़ते हैं। बहुत बार परिस्थितियों से बने दायरे भी हमारे आड़े आते रहते हैं और सरकार से जुड़े नीति-संकेत भी! कभी ये चीजें नकारात्मक होती हैं तो कभी सकारात्मक भी। तुम भी इस बात को जितना जल्दी समझ लो, अच्छा है। तुम्हारी छुट्टियाँ, मजबूरी नहीं, देशप्रेम के आवेश और तुम्हारे हठ भरे उत्साह के लिए थीं। उच्चाधिकारियों ने तुम्हारा प्रस्ताव नहीं माना, तो तुम उसी काम के लिए छुट्टी लेकर अकेले चले गए। तुम इन्टेलीजेन्ट हो, साहसी हो लेकिन तुम्हें शायद मालूम नहीं कि तुम्हें जीवित लाने के लिए हमें कितनी मशक्कत करनी पड़ी है। हम पूरे मिशन के दौरान तुम पर जाहिर भी नहीं कर सकते थे कि हम तुम्हारे साथ हैं। तुम्हारा ट्रेक रिकार्ड और समर्पण तुम्हें फिलहाल विभागीय अनुशासनहीनता के मामले से बचाए हुए है।’’ 
     ‘‘इसका अर्थ हुआ सर, आप लोग मेरे पीछे थे? जब यही सब करना था तो मेरे प्रस्ताव पर विचार क्यों नहीं किया गया?’’
     ‘‘पीछे ही नहीं, आगे भी! और उनके भी, जिनका पीछा तुम कर रहे थे। जहाँ तक तुम्हारे प्रस्ताव की बात है तो दीपक, विश्वास करना सीखो। हम टीम के रूप में काम करते हैं, हमें जो नहीं बताया जाता, उस पर भी टीम के साथ चलते हैं। चीजों को छुपाना हमारे यहाँ अविश्वास का नहीं, रणनीति का हिस्सा होता है।’’
     ‘‘लेकिन सर, कितना खतरनाक खेल खेला जा रहा है! देश की जनता को लूटकर उस पैसे को देश के ही खिलाफ उपयोग किया जा रहा है और सरकार सहित हम सब तमाशा....’’
     ‘‘दीपक, मुझे मालूम है अली के आयोजनों के आयोजकों की असलियत। जो पन्द्रह-सोलह कार्यकर्ता पाँचो शहरों में थे, उनके सम्पर्क और तमाम गतिविधियों पर हमारी नज़र थी और अभी भी है। अली के ऊपर कुछ सरकार विरोधी बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों के समर्थन से जो धनवर्षा हुई और उसका जैसे-जैसे बंटवारा हुआ, वह हमसे छुपा नहीं रह गया है। जिन आतंकी सम्पर्कों का चेहरा तुम देखकर आये हो, उसकी सूचना हम सरकार को पहले ही दे चुके हैं। लेकिन इस समय सरकार साम्प्रदायिकता के आरोपों के चलते भारी दबाव में है। इस स्थिति से बहुत सतर्कता और संवेदनापूर्ण तरीके से ही निपटना होगा। सरकार स्वयं लगातार तरीके खोजने में लगी है। जनता पर कुछ गद्दारों की पकड़ के चलते षणयंत्र को भेदना बेहद जटिल और मुश्किल हो गया है। तुमने व्यर्थ ही सप्ताह भर की छुट्टियाँ भी खराब की और अपनी जान भी जोखिम में डाली। तुम उनके निशाने पर आ चुके हो। अगले कुछ दिनों तक तुम्हें सावधान रहना है, फिलहाल कुछ दिन तुम आउटडोर ड्यूटी नहीं करोगे।’’
     दीपक को लगा जैसे सामने से कोई भयंकर चक्रवात आ रहा है। देश एक डांवाडोल धुरी पर तेजी से घूम रहा है।


03- विरोध जारी है 

      ‘‘मॉम, अपनी यह क्या हालत बना रखी है आपने? जितना आपको समझाता हूँ, आप उतना ही और उलझती जा रही हैं इस मुद्दे पर। आप क्यों नहीं मान लेतीं, इस व्यक्ति के विरोध का कोई और तरीका हमारे पास नहीं बचा है!’’
      ‘‘लेकिन यह विरोध क्यों? आखिर प्रधानमंत्री क्या गलत कर रहे हैं? जब भी बाहर निकलती हूँ, मेरे ऊपर प्रश्नों की झड़ी लग जाती है। मेरे पास किसी प्रश्न का कोई उत्तर नहीं होता। परसों की प्रेस कान्फ्रेंस में उस छोटे-से अखबार के रिपोर्टर ने जिस तरह प्रश्नों की झड़ी लगा दी, मेरे लिए बेहद पीड़ादायी थे वे क्षण। उसने मुझे तानाशाह और जनविरोधी तक कह दिया। उसके प्रश्न तर्कसंगत थे। उसके पूछने में कुछ भी तो गलत नहीं था कि जिस तरह की घटना के विरोध में हम लोगों ने सम्मान लौटाया है, वैसी घटनाएँ तो तब भी घटी थीं, जब हमें सम्मानित किया गया था। उसके समक्ष मैं निरुत्तर थी, ऊपर से तुम्हारी पार्टी के मुस्टण्डों ने उस रिपोर्टर के साथ जो बदसलूकी की, उसे कैसे जायज ठहराऊँ? सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि सम्मान तो वापस कर दिया, उसके साथ मिली लाखों की बड़ी रकम कहाँ से वापस करूँ?’’
      ‘‘मॉम, आप समझती क्यों नहीं? आप जिन उसूलों में उलझ रही हैं, उनके चलते हम इस प्रधानमंत्री को अगले पचास वर्षों तक भी नहीं हटा पायेंगे। और हम इसे हटा नहीं पाये तो पार्टी के साथ मेरा भी कैरियर चौपट समझो। मंत्री बनने का सपना बस सपना ही रह जायेगा। दाने-दाने के लिए मोहताज हो जायेंगे हम। ...इस प्रधानमंत्री को ऐसे ही वारों से हराया जा सकता है, वह भी कम से कम दस-पन्द्रह वर्षों में। इसने पता नहीं जनता पर कैसा जादू कर दिया है। यह लम्बी लड़ाई है, इसके लिए मानसिक रूप से तैयार होना पड़ेगा हम सबको। ...अच्छा एक बात बताओ, आपको अपने लेखन से अपने स्तर पर क्या मिला? पच्चीस वर्षों में केवल पाँच किताबें छपी थीं, जिन्हें भी कोई खरीदता नहीं था। रायल्टी के नाम पर एक पैसा कभी नहीं मिला। उल्टा हर किताब पर जेब से ही खर्च हुआ। जो भी मिला, पार्टी में मेरे ऊँचे सम्बन्ध बनने के बाद ही मिला। देश के दूसरे नंबर के राष्ट्र विभूषण पुरस्कार के अलावा तीस लाख के तो साहित्यिक पुरस्कार ही दिलवा चुका हूँ आपको। बीस किताबें आ चुकी हैं, जो प्रकाशकों ने अपने पैसे से छापी हैं, ढाई-तीन लाख की रायल्टी मिलती है। हजारों लोग आपको पढ़ते हैं। सैकड़ों कार्यक्रम साल भर में मिलने लगे हैं, उनकी कमाई अलग से है। यह सब जिस पार्टी ने दिलवाया, उसके लिए कुछ तो हमारा भी कर्तव्य बनता है। जिसे आप ईमानदार प्रधानमंत्री मानती हैं, वह आपको एक रुपया भी कहीं से दिलवा सकता है...?’’
      ‘‘लेकिन तीखे प्रश्नों के मैं क्या जवाब दूँ? मैं तो पूरी तरह फँस चुकी हूँ। मैं साहित्यकार हूँ, तुम्हारी तरह राजनेता नहीं। ...इन सम्मानों-पुरस्कारों से तो पहले कहीं अधिक सुकून में थी। आज तो मैं सच को सच नहीं कह सकती और झूठ को अपनाऊँ कितना!... हे प्रभु...!’’
      ‘‘मॉम, क्यों परेशान होती हो! सच और झूठ भी आज के जमाने में एक खेल से अधिक कुछ नहीं हैं। सच का खेल खेलो या झूठ का, बस अपनी पूरी क्षमता से खेलो, फिर देखो...! आज हमारे पास झूठ का खेल खेलने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। रही बात, आपको परेशान करने वाले प्रश्नों की; सो कोई भी आपसे धन वापसी के लिए कहने वाला कौन होता है? आपने सम्मान वापसी की घोषणा की है, पुरस्कार वापसी की नहीं। आप एक बार जवाब तो दो मॉम। आपका एक बार बोलना ही काफी होगा। आखिर, मानसी वर्मा कोई छोटा-मोटा नाम तो है नहीं आज। मैं तो कहता हूँ सीधे-सीधे कह दो, हमने तो पुरस्कार राशि भी लौटा दी है। मेरा दावा है, लोग आपकी बात पर अधिक विश्वास करेंगे। यदि कोई इसे झूठ बतायेगा तो हम उसे उल्टा झूठा बता देंगे। इतना शोर मचायेंगे कि सच और झूठ में अन्तर करना असंभव हो जायेगा। याद रखो मॉम, हमारी पार्टी ने सत्तर साल शासन किया है तो ऐसे ही किया है। जनता को दिन को दिन बताओगे तो वह नींद में उल्टा लटक जायेगी और दिन को रात बताओगे तो हर वक्त आपके गुण गायेगी। ...और एक बड़ी खुशखबरी सुनाऊँ, आपको तो विश्वास ही नहीं होगा!...’’
      ‘‘क्या...?’’
      ‘‘पार्टी में बड़े स्तर पर गुप्त चर्चा चल रही है, सत्ता वापसी होने पर आपको देश के सबसे बड़े सम्मान ‘राष्ट्र रत्न’ से नवाजा जायेगा।’’
      ‘‘तू मुझे बना रहा है..?’’
      ‘‘नहीं मॉम, यह बिल्कुल सच है। बस, आप थोड़ा अपने-आपको साँभाले रखिए और सच-झूठ के चक्कर में पड़ने के बजाय पार्टी के हर स्टैण्ड को समर्थन देती रहिए। आपके समर्थन से पार्टी को बहुत फायदा हो सकता है।’’
      और सच के भ्रमजाल को लाँघकर मानसी जी लांग चेयर पर फैलती हुई ‘राष्ट्र रत्न’ की कल्पनाओं में खो गईं।
      राजनेता बेटे ने टी.वी. ऑन कर दिया। स्क्रीन पर मानसी जी से प्रेरित बुद्धिजीवियों के प्रधानमंत्री विरोधी आन्दोलन का शोर गूँज रहा था।