Monday, March 7, 2016

करे तो क्या करे भर्तुआ! / उमेश महादोषी

     उसने कल पूरे गाँव में घूम-घूमकर घोषणा की थी- ‘‘कल दोपहर तीन बजे मैं पड़ोसी कस्बे के गाँधी चौक पर सरेआम आत्महत्या करूँगा।’’ लोग पहले तो उसे आश्चर्यचकित से देखते रहे। फिर यह सोचकर कि शायद भर्तुआ का दिमांग चल गया है, बच्चे, जवान, बूढ़े- सभी तालियाँ पीट-पीटकर अपना और सबका मनोरंजन करने लगे।
     भर्तुआ अपनी आत्महत्या की घोषणा कस्बे में मौजूद सभी अखबारों के दफ्तरों के सामने खड़ा हो-होकर भी कर आया था। अखबार वालों ने उसे बाबला समझकर टाल दिया।
     उसने अपनी घोषणा को थाने एवं आसपास की पुलिस चौकियों के सामने खड़े हो-होकर भी ऊँची आवाज में दोहराया था। ‘‘हाँ.... हाँ.... जरूर करना कल आत्महत्या.... अभी यहाँ से जा!’’ कहते हुए पुलिस वालों ने भी जमीन पर डंडा फटकारते हुए उसे पागल मानकर भगा दिया था।
     एस.डी.एम., तहसीलदार, राजनैतिक दलों, पक्ष-विपक्ष के जन-प्रतिनिधियों के दफ्तरों-आवासों के सामने भी खड़ा हो-होकर उसका चीखना व्यर्थ गया। सभी ने उसे अर्द्धविक्षिप्त या पागल ही करार दिया। हँसे, तालियाँ पीटीं और अपने-अपने काम में लग गये।
     लेकिन भर्तुआ न बाबला था, न अर्द्धविक्षिप्त, न पागल! न ही कोई मनोरंजन करने के लिए पीटे जाने वाला ढोल! इसलिए वह आज नियत समय पर गाँधी चौक पर आ गया था। उसने कहीं से काफी सारी सूखी झाड़ियाँ लाकर उनसे बीच चौक पर स्थित गाँधी बाबा की मूर्ति के ढाई-तीन मीटर की परिधि में घेरा डाल दिया था। उसके पास पांच लीटर वाला एक डिब्बा था, केरोसीन से भरा हुआ। उसकी जेब में माचिस थी तीलियों से ठसाठुस। उसकी गतिविधियों को संदिग्ध मानकर आने-जाने वालों में से जब तक किसी ने पुलिस और अखबार वालों को सूचना दी और दस-बीस तमाशबीन, पुलिसिए, और अखबारिए वहाँ इकट्ठा हुए, तब तक वह झाड़ियों पर केरोसीन का छिड़काव कर चुका था। माचिस जेब से निकालकर उसने गाँधी बाबा के सिर पर रख दी थी। खुद गाँधी बाबा की लाठी से सटकर खड़ा हो गया था। बचे कैरासीन का खुले मुँह का डिब्बा उसके हाथ में था।
     एक-दो पुलिस वालों और दो-तीन तमाशबीनों ने उसे पकड़ने के लिए जैसे ही घेरे को लांघने की कोशिश की, उसने फुर्ती से माचिस उठाकर एक तीली जलाई और झाड़ियों पर फेंक दी। ‘‘कोई मेरे पास नहीं आयेगा। तुम लोगों ने कोशिश की तो मैं आगे बिना कुछ कहे-सुने ही खुद पर भी केरोसीन डालकर....’’ 
     वह कुछ कहना चाहता है, समझकर उसे पकड़ने के लिए उठे कदम उसे सुनने को ठिठक गए। ’’...मैं कल से आत्महत्या करने की घोषणा कर रहा हूँ। किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि मैं क्यों ऐसा करना चाहता हूँ। अब मुझे मर जाने दो, मेरे मरने के बाद मेरी लाश के चारों ओर इकटठे होकर तुम लोग खूब हँसना, तालियाँ बजाना, इस देश और पूरे समाज को बाबला, अर्द्धविक्षिप्त, पागल कहने वाले नारे लगाना.... कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा। अधिक से अधिक कोर्ट थोड़ी सी आँखें तरेरेगा, सरकार उसके सामने खड़ी होकर दुम हिलायेगी, विपक्ष वोटों के लिए लार टपकायेगा!... और तुम... तुम सब अपने-अपने मन में कुछ दिन कबड्डी खेलना।...’’
     उसकी बात में तिलमिलाहट थी, आक्रोश था, तंज था। कुछ युवकों, एक दरोगा और सत्ता पक्ष के एक जनप्रतिनिधि ने उससे पूछा- चलो हमसे गलती हुई, हम तुम्हारी बात को ठीक से समझ नहीं पाये। लेकिन अब तो बताओ तुम्हारी समस्या क्या है? तुम चाहते क्या हो?’’
     ‘‘...बहुत खूब! जानना चाहते हो मैं क्या चाहता हूँ...मेरी समस्या क्या है... अरे तुम लोगों को तो उस रमुआ सिंह को टी.वी. पर देखने-दिखाने से फुर्सत हो तब न? जो देश को तोड़ने की कसमें सरेआम खा रहा है, जो समाज और देश की बरबादी की बात कर रहा है, उसे बचाना जरूरी है क्योंकि वह गरीब है! वाह! क्या कनेक्शन है- गरीबी और रमुआ सिंह में! लेकिन वह गरीब है तो मैं क्या हूँ? उस पर करोड़ों बरस रहे हैं, मुझ पर बरसाने के लिए तुममें से किसी की जेब में फूटी कौड़ी भी है? उसके परिवार की जिस गरीबी को तुम टी.वी. पर देख-दिखा रहे हो, उसके चलते वह देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ सकता है, उसके चलते वह देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय के सबसे बड़े पद का चुनाव लड़ सकता है, जीत सकता है! बड़ा नेता बन सकता है! वैसी ही गरीबी के चलते मेरा बेटा क्यों दसवीं भी नहीं कर पाता? मेरे बेटे को क्यों परीक्षा में बैठने से रोक दिया जाता है? जिस गरीबी के चलते रमुआसिंह बढ़िया गाड़ियों में चलता है, वैसी ही गरीबी के चलते मेरा बेटा क्यों टूटी साइकिल तक हासिल नहीं कर पाता? देश की बरबादी और देश के दुश्मनों का साथ देने की कसमें खाने वाले रमुआ सिंह को रातोंरात कोर्ट में जमानत मिल जाती है। लेकिन मेरे बेटे को एक सिपाही के द्वारा बिना बात थप्पड़ मारे जाने पर उसका हाथ पकड़ लेने के जुर्म में तीन साल जेल में काटने पड़ जाते हैं, क्यों? मेरे फत्तुआ पर कोर्ट रहम नहीं खाता, क्यों? रमुआ सिंह के साथ देश द्रोह के बावजूद आज देश के सारे विपक्षी दल खड़े हो जाते हैं, मीडिया खड़ा हो जाता है, बड़े-बड़े बुद्धिजीवी खड़े हो जाते हैं, मेरे बेटे के साथ कोई क्यों नहीं खड़ा होता? रमुआ सिंह को गरीब कहकर, गरीबों की लड़ाई लड़ने वाला कहकर जो लोग महिमामण्डित करते हैं, वही लोग प्रदेश की सरकार में रहकर मेरे फत्तुआ को सिपाही का सिर्फ हाथ पकड़-भर लेने से अपराधी घोषित कर देते हैं, क्यों? रमुआ सिंह जो चाहता, खाता है, पीता है, भयंकर अपराध के बावजूद, उसे बड़ी-बड़ी सुविधाएँ मिलती हैं। सीधे-सीधे पुलिस उस पर हाथ नहीं डाल सकती। मेरा फत्तुआ आज ठीक से न कुछ खाता है, न पीता है, गुमसुम-सा पड़ा रहता है। उसका जीवन बर्वाद हो चुका है, कोई है पूछने वाला। पक्ष-विपक्ष, मीडिया, प्रशासन, नेता-अभिनेता, सब के सब क्यों नपुंसक बन गये हैं? सबने क्योें चुप्पी साध रखी है?....’’ कहते-कहते भर्तुआ बेहोश सा होकर गिर पड़ा जमीन पर! 
     कुछ नवयुवकों ने उसकी ओर बढ़ रही आग की लपटों से बचाने के लिए जलती हुई सूखी झाड़ियों को इधर-उधर करके भर्तुआ को बाहर निकाला।
     शाम को लोगों के साथ भतुआ ने भी टी.वी. पर देखा कि रमुआ सिंह और राज्य के सरकारी दल के नेता, जिनके शासन ने भर्तुआ के बेटे को अपराधी घोषित कर रखा था, केन्द्र सरकार के खिलाफ भर्तुआ की इस स्थिति के लिए अपनी भड़ास निकाल रहे थे। भर्तुआ की बेचैनी बड़ने लगी। क्या करे वह... उसे लोगों ने मरने नहीं दिया... जिन लोगों ने उसकी गरीबी को छीन लिया... वही अब उसकी आवाज को भी छीन रहे हैं... वह पागलों की तरह अपने घर में इधर-उधर घूमने लगा। अचानक उसके हाथ आटे की मटकी आ लगी। उसने मटकी को दोनों हाथों से उठाया और आंगन की धरती पर जोर से पटक दिया। घर के बाहर उस पर निगाह रखने के लिए लगाये गए सिपाही और दो-तीन पड़ोसियों ने मटकी के फूटने की आवाज पर अन्दर आकर देखा-  दो मुट्ठी आटा पूरे आँगन में सफेद झूठ-सा बिखरा पड़ा है!

Saturday, February 27, 2016

तीन लघुकथाएँ / उमेश महादोषी

01. उस खतरनाक मोड़ पर
     प्रधानमंत्री अपने शयनकक्ष में बिस्तर पर लेटे हुए मोबाइल पर आये संदेशों पर दृष्टि डाल रहे थे। किसी ने उन्हें एक साहित्यिक चिट्ठे का लिंक भेजा था। लिंक पर क्लिक करते ही एक गुमनाम से लेखक की तीन-चार लघुकथाएं उनके सामने थीं। शीर्षकों के आकर्षण ने उन्हें पढ़ने को विवश कर दिया। पढ़ना शुरू किया तो पढ़ते ही चले गये। उन्हें लगा जैसे तमाम उत्साह और ऊर्जा के बावजूद वे शक्तिहीन हो गए हैं। वह विवशताओं के दलदल में फंसे हुए खड़े हैं। प्रधानमंत्री चिंता में डूबने लगे। डूबते ही गये। मानसिक थकावट ने हावी होकर उन्हें कब नींद के हिंडोले में झुला दिया, पता ही नहीं चला। 
     नींद में भी अचेतन मन को चिंताओं के चक्रवात मथने लगे। देश के अच्छे खासे माहौल में अचानक उठी लपटें उन्हें बेचैन करने लगीं। एक ओर जहाँ मुनाफाखोरी, कालाबाजारी और काले धन के जहर से बढ़ती महँगाई, दूसरी ओर छोटी-छोटी बातों को लेकर साम्प्रदायिक उन्माद फैलाते विरोधी नागों की तरह फन फैलाए खड़े नज़र आये। महँगाई और भ्रष्टाचार को नियन्त्रित करने के लिए उनके कदमों में तानाशाही एवं शक्ति के केन्द्रीकरण को देखा जाने लगा। आरोपों के बहाने घटिया आलोचना से आ रहा विचलन काँटे सा चुभने लगा। इस आलोचना में कहीं न कहीं उनकी पार्टी के लोगों को उनके रास्ते के विरुद्ध उकसाने की कार्यवाही भी शामिल दिखाई दी। जनता और कार्यकर्ताओं में फैलाया जा रहा यह भ्रम, गोया सत्ता के अनेक केन्द्र होने जरूरी हैं और यह प्रधानमंत्री अपने इर्द-गिर्द केवल एक ही केन्द्र स्थापित कर रहा, एक खतरनाक भेड़िए की तरह मुँह फैलाए दिखाई दिया। सत्ता के अनेक केन्द्रों के कारण फैलने वाले भ्रष्टाचार को देख चुकने के बावजूद जनता का एक वर्ग केन्द्रीय सत्ता के एक केन्द्र पर विश्वास से डिग रहा था। पार्टी के कई नेता भी प्रधानमंत्री में खोट देखते प्रतीत हुए। साहित्यकारों-कलाकारों का एक वर्ग विपक्षियों के हाथों का खिलौना बना आतंकी बाज की तरह उनके शान्ति और विकास के प्रयासों के कबूतर पर झपटता दिखा....। उन्हें यह जानकर बेहद आश्चर्य हुआ कि आतंकवाद के खिलाफ उनकी मुहिम से सबसे अधिक देश के ही कुछ विपक्षी नेता और तथाकथित बुद्धिजीवी विचलित हो रहे हैं।
     अचानक प्रधानमंत्री बड़बड़ाते-से उठे तो किसी मन्दिर के लाउडस्पीकर से आ रही दुर्गा चालीसा की पंक्तियाँ कानों में पड़ती-सी सुनाई दीं- 
शक्ति रूप को मरमु न पायो।
शक्ति गई तब मन पछतायो।।
     वह थोड़ी देर नार्मल होने के लिए बिस्तर में बैठे रहे। रात भर अचेतन मन को मथते रहे तमाम दृश्य आँखों के सामने तेजी से घूमने लगे, उतनी ही तेजी से दुर्गा चालीसा की पंक्तियाँ कानों में रह-रहकर टकराने लगी। बेचैनी बढ़ती गई...बढ़ती गई। अचानक वह उठकर खड़े हो गये। ओढ़ी हुई चादर का एक कोना उनके एक हाथ की उँगलियों की पकड़ में था और दूसरा कोना दूसरे हाथ की उँगलियों की। अचानक उन्होंने दोनों कोनों को पूरी ताकत से विपरीत दिशा में खींच दिया, चादर बीच में से फटती चली गई। फैली हुई बाँहों से चादर के दोनों टुकड़ों को विपरीत दिशाओं में फेंका और सीने को फुलाते हुए तेज कदमों से चलते हुए बैडरूम से निकलकर लिविंग हॉल में आकर एक निर्णायक मुद्रा में खड़े हो गए। उनकी आँखें लगातार फैल रही थीं और उनसे अजीब किस्म का तेज निकलकर त्वरित गति से वातावरण में समाहित हो रहा था।


02- देश डांवाडोल धुरी पर घूम रहा है
     ‘‘आ गए दीपक बाबू! इतना लम्बा अवकाश तो आपने पहले कभी नहीं लिया, क्या किसी विशेष यात्रा पर गए थे? बहुत थके-थके से लग रहे हैं?’’
     ‘‘आप तो जानते हैं सर, मैं अवकाश लेता ही नहीं हूँ। ये छुट्टियाँ तो मजबूरी में लेनी पड़ी। लेकिन मैं बहुत निराश हूँ!’’
     ‘‘मैं कुछ समझा नहीं? छुट्टियाँ, मजबूरी, निराशा? क्या है यह सब?’’
     ‘‘देश में पाकिस्तानी ग़ज़ल गायक शराफत अली के आने का शोर-शराबा तो सुनते ही रहे हैं, सर...’’
     ‘‘मुझे सब मालूम है, दीपक! पर लगता है, कुछ बातें तुम्हारी समझ में नहीं आतीं। .... दीपक,  देश की सर्वाेच्च सुरक्षा जाँच एजेन्सी का हिस्सा जरूर हैं हम लोग, लेकिन हमें अपने दायरे एक सीमा से अधिक बनाने की आजादी नहीं है। देश और अपने समाज की विविधता से जुड़ी कई चीजों के मद्देनजर हमें सावधानी से कदम रखने पड़ते हैं। बहुत बार परिस्थितियों से बने दायरे भी हमारे आड़े आते रहते हैं और सरकार से जुड़े नीति-संकेत भी! कभी ये चीजें नकारात्मक होती हैं तो कभी सकारात्मक भी। तुम भी इस बात को जितना जल्दी समझ लो, अच्छा है। तुम्हारी छुट्टियाँ, मजबूरी नहीं, देशप्रेम के आवेश और तुम्हारे हठ भरे उत्साह के लिए थीं। उच्चाधिकारियों ने तुम्हारा प्रस्ताव नहीं माना, तो तुम उसी काम के लिए छुट्टी लेकर अकेले चले गए। तुम इन्टेलीजेन्ट हो, साहसी हो लेकिन तुम्हें शायद मालूम नहीं कि तुम्हें जीवित लाने के लिए हमें कितनी मशक्कत करनी पड़ी है। हम पूरे मिशन के दौरान तुम पर जाहिर भी नहीं कर सकते थे कि हम तुम्हारे साथ हैं। तुम्हारा ट्रेक रिकार्ड और समर्पण तुम्हें फिलहाल विभागीय अनुशासनहीनता के मामले से बचाए हुए है।’’ 
     ‘‘इसका अर्थ हुआ सर, आप लोग मेरे पीछे थे? जब यही सब करना था तो मेरे प्रस्ताव पर विचार क्यों नहीं किया गया?’’
     ‘‘पीछे ही नहीं, आगे भी! और उनके भी, जिनका पीछा तुम कर रहे थे। जहाँ तक तुम्हारे प्रस्ताव की बात है तो दीपक, विश्वास करना सीखो। हम टीम के रूप में काम करते हैं, हमें जो नहीं बताया जाता, उस पर भी टीम के साथ चलते हैं। चीजों को छुपाना हमारे यहाँ अविश्वास का नहीं, रणनीति का हिस्सा होता है।’’
     ‘‘लेकिन सर, कितना खतरनाक खेल खेला जा रहा है! देश की जनता को लूटकर उस पैसे को देश के ही खिलाफ उपयोग किया जा रहा है और सरकार सहित हम सब तमाशा....’’
     ‘‘दीपक, मुझे मालूम है अली के आयोजनों के आयोजकों की असलियत। जो पन्द्रह-सोलह कार्यकर्ता पाँचो शहरों में थे, उनके सम्पर्क और तमाम गतिविधियों पर हमारी नज़र थी और अभी भी है। अली के ऊपर कुछ सरकार विरोधी बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों के समर्थन से जो धनवर्षा हुई और उसका जैसे-जैसे बंटवारा हुआ, वह हमसे छुपा नहीं रह गया है। जिन आतंकी सम्पर्कों का चेहरा तुम देखकर आये हो, उसकी सूचना हम सरकार को पहले ही दे चुके हैं। लेकिन इस समय सरकार साम्प्रदायिकता के आरोपों के चलते भारी दबाव में है। इस स्थिति से बहुत सतर्कता और संवेदनापूर्ण तरीके से ही निपटना होगा। सरकार स्वयं लगातार तरीके खोजने में लगी है। जनता पर कुछ गद्दारों की पकड़ के चलते षणयंत्र को भेदना बेहद जटिल और मुश्किल हो गया है। तुमने व्यर्थ ही सप्ताह भर की छुट्टियाँ भी खराब की और अपनी जान भी जोखिम में डाली। तुम उनके निशाने पर आ चुके हो। अगले कुछ दिनों तक तुम्हें सावधान रहना है, फिलहाल कुछ दिन तुम आउटडोर ड्यूटी नहीं करोगे।’’
     दीपक को लगा जैसे सामने से कोई भयंकर चक्रवात आ रहा है। देश एक डांवाडोल धुरी पर तेजी से घूम रहा है।


03- विरोध जारी था
     शहर में हुई साम्प्रदायिक घटना की प्रधानमंत्री कड़े शब्दों में निन्दा करते हुए राज्य सरकार को उच्चस्तरीय जाँच और कानून व्यवस्था के सुधार हेतु एडवाइजरी जारी करवा चुके थे। फिर भी केन्द्र सरकार को ही इसके लिए दोषी मानकर देश के सर्वाेच्च साहित्यिक सम्मान से विभूषित एक जमाने के सुप्रसिद्ध लेखक मानस जी ने विरोधस्वरूप स्वयं को दिया गया सम्मान वापस करने की घोषणा कर दी थी। सम्मान वापसी पर अपनी भावनाओं को विस्तार से रखने के लिए आयोजित प्रेस-कान्फ्रेन्स में उन्होंने अपनी बात रखने के साथ उन्होंने कानून व्यवस्था पर पत्रकारों के केन्द्र की स्थिति से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए। घिसे-पिटे वक्तव्य और वैसे ही प्रश्नात्तरों के साथ प्रैस वार्ता समाप्ति की ओर थी कि एक नौजवान पत्रकार, जिसके प्रश्नों को कवर करने हेतु प्रांगण के चारों ओर से कई कैमरामैन पूरी तैयारी और सतर्कता के साथ मौजूद दिखे, खड़ा होकर मानस जी की ओर मुखातिब हुआ- ‘‘क्षमा करें सर, यद्यपि मैं एक स्थानीय और छोटे समाचार चौनल और उसके पत्र का प्रतिनिधि हूँ, लेकिन प्रश्न पूछने का अधिकार तो मुझे भी मिलना ही चाहिए।’’
     ‘‘पूछिए, क्या पूछना चाहते हैं?’’ मानस जी ने लापरवाही से कहा।
     सर, जब से मीडिया में आपके सम्मान वापसी का समाचार आया है, हमने अनेक आम लोगों से बात की है। लोगों से हुई बातचीत में जो प्रश्न उभरकर आये हैं, उनमें से कुछ प्रमुख प्रश्नों पर अपने दर्शकों व पाठकों के लिए आपके उत्तर चाहता हूँ। मेरा पहला प्रश्न है- आप जिस सम्मान को लौटा रहे हैं, उसे आप देश के द्वारा दिया गया सम्मान मानते हैं अथवा सरकार या सत्तारूढ़ दल के द्वारा दिया गया सम्मान? यदि यह देश के द्वारा दिया गया सम्मान है, तो क्या सम्मान लौटाकर आप देश का विरोध कर रहे हैं?
     सर, दूसरा प्रश्न है- जिस समय आपको यह सम्मान दिया गया था, तब इस पर विवाद हुआ था। इसे हासिल करने के लिए पर्दे के पीछे जोड़तोड़ के आरोप भी लगे थे। जब आप इतने ही संवेदनशील हैं, तो आपने उस समय इसे स्वीकार क्यों किया था?
     जब आपको यह सम्मान दिया गया था, उस समय भी देश के हालात आज के हालातों से इतर नहीं थे। उस समय की सरकारों द्वारा दिखाई गई संवेदनहीनता के अनेक उदाहरण आज भी लोगों के दिलोदिमांग में मौजूद हैं। लेकिन तब आपने सम्मान स्वीकार किया था, आज वैसे ही हालातों में लौटा रहे हैं? पत्रकार का तीसरा प्रश्न था।
     सर, मैंने जो जानकारी एकत्रित की है, उसके अनुसार इस सम्मान से पूर्व आपकी केवल पाँच पुस्तकें प्रकाशित हुई थी और प्रकाशक भी आपको बामुश्किल ही मिले थे। रायल्टी तो नाममात्र की ही आपको मिलती थी। सम्मान के बाद आपकी पच्चीस से अधिक पुस्तकें आ चुकी हैं। प्रकाशक आपके पीछे घूमते हैं, रायल्टी भी लाखों में मिल रही है। अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति और अनेक विदेश यात्राओं को बोनस में गिना जा सकता है। जिस सम्मान के कारण यह सब आपको मिला है, क्या सम्मान के साथ यह सब भी लौटायेंगे? इस प्रश्न का उत्तर जनता जानना चाहती है।
     क्या आप सम्मान-पत्र के साथ सम्मान राशि भी लौटा रहे हैं? यदि हाँ तो लौटाई जाने वाली राशि का स्रोत क्या है?
     आप वर्तमान प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को हमेशा से व्यक्तिगत तौर पर नापसंद करते रहे हैं, जबकि इस प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को कुछ ही माह पूर्व जनता ने चुना है। तो क्या यह आपकी व्यक्तिगत नापसंद को देश पर थोपना नहीं माना जाये? क्या यह सीधा जनता और लोकतंत्र का विरोध नहीं है? और क्या यह आपके अन्दर की असहिष्णुता और तानाशाही प्रवृत्ति का संकेत नहीं माना जाना चाहिए?
     पत्रकार प्रश्न-दर-प्रश्न दाग रहा था, मंच पर मानस जी चुप थे। किन्तु कुछ नौजवान, जो उन राजनैतिक दलों से संबद्ध थे, जो मानस जी को सपोर्ट कर रहे थे, आक्रोश से भरे गालियाँ देते हुए उस नौजवान पत्रकार की ओर तेजी से बढ़ने लगे। कैमरों की फुर्ती और कुछ पत्रकारों की चेतावनी प्रांगढ़ में गूँज उठी- मानस जी, सब कुछ कैमरों में बन्द हो रहा है। इस गुंडागर्दी को रोकिए। आप जवाब दें या न दें, आपका अधिकार है, प्रश्न पूछना पत्रकार का....
     मानस जी चुपचाप उठकर जा चुके थे। नौजवान पत्रकार अपनी जान बचाकर भाग रहा था। कैमरामैन सारे दृश्य प्रकाश-किरणों में परिवर्तित कर कैमरों में कैद कर रहे थे।....

Monday, December 14, 2015

हिन्दी कहानी का समकालीन परिदृश्य : एक नोट

{यद्यपि इस ब्लॉग पर मैं अपनी कथात्मक रचनाएँ ही डालते रहना चाहता था, किन्तु अब लगता है कि अन्य गद्य लेखन के लिए भी इसका उपयोग इसे अधिक प्रभावी बनाएगा। इसलिए एक संगोष्ठी में पढ़ने के लिए तैयार किया हिन्दी कहानी के समकालीन परिदृश्य पर यह आलेख मित्रों के अवलोकनार्थ यहाँ प्रस्तुत है। कुछ अपरिहार्य कारणों से संगोष्ठी में जाना संभव नहीं हो पाया, ऐसी स्थिति में इस आलेख का यही एक उपयोग मुझे बेहतर लगा।} 

डॉ. उमेश महादोषी
आशाजनक और संभावनाओं से भरपूर परिदृश्य का संकुचित और निराशाजनक प्रक्षेपण 

          सामान्यतः किसी भी साहित्य या उसकी विधा के समकालीन परिदृश्य पर चर्चा का उद्देश्य उस विधा के माध्यम से मानवीय जीवन पर काल सापेक्ष परिवर्तनों के साथ परिस्थितियों और घटनाओं की प्रकृति एवं प्रवृत्तियों के वास्तविक प्रभाव को समझना होता है। इस सन्दर्भ में हिन्दी कहानी अपने समय के साथ आगे बढ़ी है और उसने कई ऊँचाइयों को भी छुआ है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन इसके समकालीन परिदृश्य का वास्तविक सच थोड़ा जटिल है। समकालीन परिदृश्य पर जो चर्चा में है, वह उसका एक हिस्सा है। उससे इतर हिन्दी कहानी का बड़ा हिस्सा वह है, जिसका या तो नोटिस नहीं लिया गया है या फिर वह नोटिस लेने वालों की दृष्टि तक पहुँचने का रास्ता ही नहीं पा सका। दूसरी ओर हिन्दी कहानी का जितना अंश प्रक्षेपित हो पाया है, उसमें समकाल स्वतंत्र और वास्तविक रूप में प्रतिबिम्बित हो पाया हो, विशुद्ध रूप से नहीं कहा जा सकता। ऐसा मुझे इसलिए लगता है कि आधुनिक हिन्दी कहानी की अब तक की यात्रा का करीब-करीब प्रत्येक कालखण्ड, अपने समय के कुछ प्रभावशाली कथाकारों, समालोचकों और संपादकों के व्यक्तित्व और दृष्टि के प्रभाव की गिरफ्त में रहा है। कुछ चीजें अच्छी रही हैं तो कुछ चीजें साहित्येतर कारकों से प्रभावित रही हैं। साहित्य, विशेषतः कहानी को प्रभावित करने वाले सातवें दशक और उसके बाद के कथाकारों, समालोचकों और संपादकों को अनेक शक्तिशाली मंचों पर नियन्त्रण के कारण परिदृश्य को प्रभावित करने वाली वृहत शक्तियों और साधनों के साथ लम्बा कार्यकाल भी मिला है। परिणामस्वरूप एक ओर कुछ सुनिश्चित प्रभावों वाला कालखण्ड लम्बा होता गया है और दूसरी ओर हिन्दी कहानी में सामयिक प्रभावों के साथ व्यक्तिपरक प्रभाव भी समाहित होते चले गये हैं। आज हम हिन्दी कहानी के समकालीन परिदृश्य पर बात करते हैं तो निश्चित रूप से दस-पन्द्रह वर्षों का नहीं, चार-पाँच दशकों का कालखण्ड हमारे सामने होता है, जिसमें घटनाएँ और दृश्य बदलते हैं, प्रयोग होते हैं लेकिन दृष्टि एक रीड़ की हड्डी के साथ चिपकी हुई है। प्रमुखतः वही कहानीकार उभरते और चर्चा के केन्द्र में आतेे हैं, जो किसी प्रभामण्डल के साथ सम्बद्ध होते चले जाते हैं। स्वतन्त्र दृष्टि वाले और स्वतंत्र पथ पर चलने वाले कई कथाकार अच्छा लिखकर भी चर्चा में नहीं आ पाते। ऐसी स्थिति में इस कालखण्ड की कहानी पर होने वाली चर्चा में बार-बार उन्हीं कहानियों और कथाकारों की बात होती है, जो किसी न किसी चबूतरे से सम्बद्ध हैं। यहाँ तक कि विभिन्न समूहों/वर्गो पर आधारित विमर्श का दर्शन भी घूम-फिरकर आस्था के उन्हीं चबूतरों पर आकर टिक जाता है। समग्रतः मानव जीवन को जटिलताओं से निकालकर सहज-सरल, सामयिक और जीने योग्य बनाने वाली विशुद्ध दृष्टि बहुधा वहाँ आकार नहीं ले पाती है। लेकिन इन चीजों से इतर हिन्दी कहानी में कथा-सृजन की एक ऐसी धारा भी निरन्तर बहती रही है, जिसने काल सापेक्ष परिवर्तनों और परिस्थितियों की प्रकृति एवं प्रवृत्तियों के प्रभाव को स्वतन्त्र दृष्टि से देखा और समझा है। उपेक्षाओं के बावजूद जिसने बिना किसी आग्रह-दुराग्रह के सहज-सरल मनुष्यता के रास्ते को दिखाने का प्रयास किया है। हम हिन्दी कहानी के किसी भी काल परिदृश्य की वास्तविक चर्चा में इस धारा की अवहेलना करके आगे बढ़ेंगे, तो निश्चित रूप से हम अधूरेपन और दुराग्रही चीजों के साथ होंगे। 
          इस कथा-धारा के साथ हमें एक चीज और देखने को मिलती है, आधुनिक हिन्दी कहानी के करीब-करीब सवा सौ साल की यात्रा के दौरान उसमें जुड़ी अनेक सकारात्मक चीजें साथ चल रही हैं। यदि हम हर धारा, हर वर्ग के, नए-पुराने, प्रतिष्ठित-अप्रतिष्ठित सभी तरह के कहानीकारों के सन्दर्भ में बात करें तो जुड़ते गए तमाम तत्वों और तमाम पैटर्न पर आधारित कहानियाँ लिखी जा रही हैं। समग्रतः जुड़ा हुआ तो बहुत कुछ दिखाई देता है, निकला हुआ या ऐसा जिसे समाप्त हो गया मान लिया जाए, कुछ नहीं है। इसे हिन्दी कहानी के समकालीन परिदृश्य में एक साथ परम्परा और प्रगति की विविधिताओं की उपस्थिति के रूप में देखा जा सकता है। वैचारिक स्तर पर मानव जीवन की सुरक्षा के साथ मानवीय मूल्यों के संरक्षण के प्रश्न और प्रगति की आकांक्षा से जुड़ी तीव्रतर होती चिंताएँ एक साथ मौजूद हैं। परिदृश्य में विविधता के तत्व के रूप में ही नहीं, कभी-कभी एक ही रचना में दोनों तरह की चिंताएँ एक साथ भी देखने को मिल जाती हैं। इनमें से जो चीजें कहानी के परिदृश्य में मानवीय जीवन के समकालीन परिदृश्य में उपस्थित भावनात्मक एवं सामाजिक-आर्थिक यथार्थ से आई हुई हैं, वे मुझे सकारात्मक लगती हैं। और इसलिए, कहानी की विकास यात्रा के सन्दर्भ में, परिदृश्य में परम्परा और प्रगति की एक साथ उपस्थिति मुझे शुभ संकेत लगती है। इस परिदृश्य में कट्टरपन के विरोध और वाद विशेष के नाम पर कई विवादास्पद चीजें भी हैं। ये चीजें मानवीय जीवन की सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं की बजाय, निश्चित रूप से श्रेणीबद्ध मनुष्य की निहायत व्यक्तिगत और कुछ कुण्ठित आकांक्षाओं के सार्वजनिकीकरण के प्रयासों और रणनीतिक विमर्श से निकलकर आई हुई हैं, इसलिए ये चीजें विद्यमान यथार्थ से अपेक्षित यथार्थ के बीच के फासले को मानवीय फलक के निर्माण की दृष्टि से तय कर पायेगी, मुझे इसमें संदेह है। किन्तु हिन्दी साहित्य के दूसरे रूपों की तरह हिन्दी कहानी में भी ऐसी चीजें उपस्थित तो हैं ही।
          यहाँ एक बात पर चर्चा करनी जरूरी लग रही है। हिन्दी कहानी की समकालीन चर्चाओं में उसे भारतीयता के दायरे से बाहर लाने के प्रयास भी देखे गये हैं। संभवतः ऐसा प्रगति की अवधारणा को सांस्कृतिक आस्था की अवधारणा के खिलाफ मानने के कारण हुआ। यदि ऐसा ही है तो इन प्रयासों से क्या हासिल होना है? क्या भारतीयता से शून्य होकर हिन्दी कहानी हिन्दी की रह जायेगी? थोड़ी देर के लिए इस प्रश्न को भुला भी दें, तो भारतीयता का प्रगति से क्या विरोध है? नकारात्मकताओं से विरोध हो सकता है, लेकिन यदि प्रगति मनुष्य और मनुष्यता के पक्ष में है तो भारतीयता तमाम संस्कृतियों के सापेक्ष सबसे अधिक प्रगति की पक्षधर है। निसंदेह भारतीयता सांस्कृतिक आस्था की द्योतक है, लेकिन उसने जोखिम उठाकर भी नई चीजों को हमेशा ग्रहण किया है। वह विविधता से भरपूर है। उसमें मानवीयता का गुण किसी भी और संस्कृति से कहीं अधिक है। सामाजिक और व्यक्तिपरक समस्याओं का समाधान देती है। उच्छृखंलता और मूल्यहीनता का विरोध जरूर उसकी प्रकृति में शामिल है। और मूल्यहीनता एवं नये मूल्यों की स्थापना में अन्तर होता है। आप प्रगति के रास्ते नये मूल्य लाना चाहते हैं तो लाइये, भारतीयता ने कब रोका है! किन्तु नये मूल्यों के नाम पर उच्छृखंलता और मूल्यहीनता निश्चित रूप से आपत्तिजनक है। यह मनुष्य और मनुष्यता के भी खिलाफ है। चूँकि हिन्दी भारतीय जनमानस से जुड़ी हुई भाषा है, इसलिए हिन्दी कहानी में भारतीयता का समावेश, उकसाने वाले विचारों और कार्यवाहियों के बावजूद होगा ही। जो हिन्दी और हिन्दी में रची-बसी भारतीयता को नहीं जानते-समझते, उनके जीवन-सत्य और जीवन मूल्यों को हिन्दी कहानी में लाकर भारतीयता को अन्यान्य जीवन मूल्यों से प्रतिस्थापित करने के प्रयास मुझे नहीं लगता, स्थापित हो पायेंगे। हाँ, संस्कृतियों की पारस्परिक समझ के प्रयास कुछ अर्थों में अवश्य सफल हो सकते हैं। तमाम वैश्वीकरण के बावजूद किसी भी संस्कृति के लोग दूसरी संस्कृतियों को सामान्यतः उतना ही ग्रहण कर पाते हैं, जितना अपनी मूल संस्कृति के साथ ग्रहण किया जा सकता है। नकल करके कोई असल नहीं बन सकता। अनेक हिन्दी वाले अंग्रेजी और अंग्रेजियत अपनाने में गौरव महसूस करते हैं, लेकिन क्या वे हिन्दी का आचरण व संस्कार अपने स्वभाव और व्यवहार से निकाल पाते हैं? हिन्दी के आचरण और संस्कार को ग्रहण करने के सन्दर्भ में दूसरी भाषाओं के अनेकानेक लोगों के बारे में भी यही सच है। यदि भारतीय पात्रों और वातावरण के साथ हम चलेंगे तो क्या भारतीयता से जुड़े प्रश्नों से हम बच पायेंगे? और यदि हम इससे इतर कहानी के किसी स्वरूप की कल्पना करते हैं तो यह भी सोचना पड़ेगा कि वह कहानी कितना हिन्दी की रह जायेगी! आप आने वाले किसी समय बिन्दु की कल्पना करें या भारत से बाहर किसी देश की अथवा भारत में भारत से बाहर के किसी विचार-व्यवहार की, यदि बात हिन्दी कहानी में होगी तो किसी न किसी रूप में भारतीय मानस आकर खड़ा हो ही जायेगा। सकारात्मक प्रगति के प्रयोग भी या तो परम्परा से निकलते मिलेंगे या फिर परम्परा में ढलते, दोनों बातें एक साथ भी संभव हैं। यही हमारा स्वभाव है, संस्कार है। कम से कम, अब तक के परिदृश्य में हिन्दी कहानी का यही सत्य है। हिन्दी कहानी में अतिवादी प्रयोगों के माध्यम से जो नकारात्मक चीजें आ रही हैं, वे उसका स्थाई चरित्र नहीं बन पायेंगी। येनकेन हिन्दी कहानी का मूल चरित्र, उसकी भावनात्मक और सामाजिक आस्थाओं के साथ आगे बढ़ेगा और उसका स्रोत भावनात्मक एवं सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के मध्य ही मिलता रहेगा। मानवीय जीवन में परिवर्तन की कोई भी प्रक्रिया उसके मूल चरित्र को नहीं बदल सकती।
          भाषा और शिल्प के सन्दर्भ में भी हिन्दी कहानी के समकालीन परिदृश्य में भी विविधिता देखने को मिल रही है। प्रयोगों के साथ अनेक परम्पराओं का अनुसरण हो रहा है। नये प्रयोगों में कुछ जहाँ सहज और सरलता के साथ ग्राह्य हैं, वहीं बोझिल और उबाऊ चीजों से अनावश्यक विस्तार पाठकों के धैर्य की परीक्षा लेता भी मिल जाता है। एक ओर जहाँ सामान्य कहानी लेखन में चार-पाँच पृष्ठों में बात बन जाती है, वहीं बीस-बाईस पृष्ठों की कहानियाँ भी सामान्य प्रचलन में हैं। कई जगह तो यह आश्चर्यजनक सा लगता है। इस एक-पाँच के सामान्य अनुपात में ऐसी अनेक कहानियाँ मिलती हैं, जिनके कन्टेंट को कहानी की माँग के हिसाब से न्यायसंगत ठहराया जा सकना मुश्किल है। कई कहानियों को काव्यात्मक प्रतिभा का इकतरफा प्रदर्शन उबाऊ और बोझिल बनाता दिखाई देता है। कई मित्रों की तरह एक पाठक के तौर पर मैं स्वयं भी ऐसी कहानी को पहले पाठ में पूरा नहीं पढ़ पाता। बाद के पाठों में भी शायद ही उतनी सघनता आ पाती हो, जितनी आना चाहिए, जब तक कि समीक्षा अथवा किसी अन्य विशेष उद्देश्य की बाध्यता सामने न हो। साहित्य में रचनात्मकता के निखार और सम्प्रेषण में कलात्मकता की भूमिका सहायक की होती है। रचनात्मकता को आच्छादित करने वाली अतिरिक्त कलात्मकता साहित्य के उद्देश्य प्राप्ति में बाधक ही होगी, उसके लिए साहित्य में सीमित स्थान ही होता है। ऐसी कलात्मकता साहित्येतर विधाओं में अधिक प्रभावी होती है और वहाँ रचनात्मकता सहायक की भूमिका निभाती है। कलात्मकता से आच्छादित कहानियाँ लिखी जा रही हैं, समीक्षकों और समालोचकों के मध्य कई कारणों से चर्चा भी पा जाती हैं, लेकिन पाठकों की दृष्टि को पूरी तरह अपने आगोश में लेने में सफल नहीं हो पातीं।
          समकालीन परिदृश्य में परम्परा और प्रगति की विविधताओं के बावजूद हिन्दी कहानी का सबसे निराशाजनक पहलू कथा विमर्श का संकुचित दायरा, जिसके चलते अब तक बहुत सारे कहानीकारों के पाठक तक पहुँचने के रास्ते भी सीमित रहे हैं और मान्य समझे जाने वाले समीक्षकों-समालोचकों एवं संपादकों का ध्यान आकर्षित करने के अवसर भी। अनेक अच्छी कहानियाँ न तो पाठकों तक पहुँच पा रही हैं, न ही समीक्षकों और समालोचकों तक। माहौल कुछ ऐसा लगता है मानो अनेक कथा रचनाएँ कहानी हैं ही नहीं। समीक्षक-समालोचक सीमित रचनाकारों को पढ़ते हैं और सीमित पर ही लिखते हैं। उनकी अपनी मिकेनिज्म है। कुछ विवशताएँ भी हो सकती हैं। स्थापित पत्र-पत्रिकाओं की नीतियाँ भी सीमित लोगों पर केन्द्रित होती हैं। बिना किसी कारण के प्राप्त लिफाफों पर ‘रिफ्यूज्ड एण्ड रिटर्न टू दा सेन्डर’ एवं ‘अयाचित सामग्री, अतः वापस’ की स्टाम्प लगाकर उन्हें वापस करने की पोषित परम्परा को तो मैंने स्वयं देखा है। लिफाफों में क्या है, देखने तक का समय या व्यवस्था आपके पास नहीं हैं। और फिर इस तरह की चीजें क्या संकेत देती हैं? अपने दायरे के लोगों के अलावा दूसरे लोग क्या लिख रहे हैं, उसे जानने-समझने की आपको आवश्यकता नहीं है। तो आपके काम की गुणवत्ता कैसे प्रामाणिक होगी? ऐसे में कहानी हो अथवा कोई अन्य विधा, उसके बारे में श्रेष्ठतर अथवा महत्वपूर्ण के अवलोकन और आंकलन के दावे कैसे किए जा सकते हैं? इससे क्या साहित्य में किए जाने वाले अनेक दावों की प्रामाणिकता संदिग्ध नहीं हो जाती है? क्या पता हिन्दी कहानी का श्रेष्ठतम किसी बन्द लिफाफे में चिरनिद्रा में पड़ा हो! न भी हो तो भी क्या किसी रचनात्मकता को परिदृश्य से इस तरह गायब किए जाने को उचित ठहराया जा सकता है?
          मुझे लगता है कि समकालीन परिदृश्य में अनेक ऐसी कहानियाँ हैं, जो बहुत पाठकों तक भले नहीं पहुँच पाई हैं, जो समीक्षकों-समालोचकों-संपादकों का स्पर्श भले न पा सकी हैं लेकिन भावनात्मक और आर्थिक-सामाजिक परिवर्तनों और परिवर्द्धन की प्रक्रिया के तमाम परिणामों के साथ काल के भावी संकेतों को भी समेटे हुए हैं। पिछले दिनों आये लघुकथा से जुड़े और कुछ अन्य, डॉ. सतीश दुबे (कोलाज), प्रबोध कुमार गोविल (थोड़ी देर और ठहर), डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ (और रमा लौट आई), कमलेश भारतीय (दरवाजा कौन खोलेगा), डॉ. बलराम अग्रवाल (खुले पंजो वाली चील), माधव नागदा (परिणति तथा अन्य कहानियाँ), डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम’ (पत्थर हुए लोग), शशिभूषण बड़ौनी (भैजी) जैसे कथाकारों के कहानी संग्रहों को मैंने देखा है। लेकिन इन और ऐसे ही अन्य संग्रहों की किसी कहानी का नोटिस किसी प्रभावशाली स्तर पर शायद ही लिया गया हो। डॉ. दुबे के ‘कोलाज’, विशेष रूप से उसमें शामिल ‘एक अन्तहीन परिचय’ जैसी कहानी चर्चा में अपना स्थान नहीं बना पाती है, तो मुझे आश्चर्य जरूर होता है कि हम कौन सी जमीन से जुड़ी किस समकालीन कहानी की बात कर रहे हैं! मुझे लगता है कि यदि हिन्दी कहानी के समकालीन परिदृश्य को ठीक ढंग से समझना है तो कुछ नए, परिश्रमी और निष्पक्ष समीक्षकों-समालोचकों को स्वतंत्र दृष्टि के साथ सामने आना होगा। बड़ी पत्रिकाओं के समक्ष कुछ लघु पत्रिकाओं को अपने संसाधनों के सदुपयोग के बारे में भी थोड़ा नियोजित और तार्किक ढंग से सोचना होगा। दूसरी ओर चर्चाबदर कथाकारों को भी इन लघुपत्रिकाओं के प्रति अपने दृष्टिकोंण में सकारात्मकता लाते हुए सामंजस्य बैठाना होगा। निसन्देह हिन्दी कहानी का समकालीन परिदृश्य आशाजनक और संभावनाओं से भरपूर है किन्तु उसका प्रक्षेपण संकुचित और निराशाजनक है। समय बदल रहा है, इन्टरनेट पर स्वतन्त्र चिट्ठों और सोशल साइट्स पर कथा रचनाओं का आगमन आरम्भ हो चुका है। रचनाकार को पाठकों तक पहुँचने का आसान और स्वतंत्र साधन मुहैया हो रहा है। इसके उपयोग में दक्षता के साथ नए उपेक्षित कथाकार का मुखरित होना भी आरम्भ होगा ही। समीक्षकों-समालोचकों-संपादकों का एकाधिकार भी लम्बे समय तक स्थापित रहने वाला नहीं है। उम्मीद है हिन्दी कहानी का वास्तविक परिदृश्य कुछ वर्षों बाद कहीं अधिक साफ दिखाई देगा।


  • वर्तमान संपर्क : 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र. / मोबाइल : 09458929004

Tuesday, December 31, 2013


रूपान्तरण   


 दोपहर से ही उन दोनों का मूड खराब था। एक-दूसरे के व्यवहार को गलत मानते हुए, बिना करवट बदले एक-दूसरे की ओर पीठ किए लेटे थे। सोचते-सोचते समय के एक क्षण पर आकर निशा के अहं के कदम ठहर से गए। अन्तर्मन में चल रही पिक्चर को उसने बार-बार आगे-पीछे मूव करके देखा।
     क्या विद्यु सचमुच गलत था और वह सही?....उत्तर में सकारात्मक ध्वनि नहीं निकल पा रही थी। बात छोटी सी ही सही, पर विधु की बात में गलत क्या था। उसने आखिर इतना ही तो कहा था- परफारमेंस, परफारमेंस होती है। वह टी.वी. कार्यक्रम में नियोजित आर्टिस्टों द्वारा दी गई हो या गली-मोहल्ले की सड़कों पर घुमक्कड़ों के द्वारा। बल्कि घुमक्कड़ों द्वारा दी गई परफारमेंन्स कहीं स्वाभाविक होती है। इसलिए इन घुमक्कड़ों को भी जनता से उतना ही प्रोत्साहन पाने का हक है, जितना नियोजित टी.वी. आर्टिस्टों को। उसके द्वारा घुमक्कड़ों की तुलना भिखारियों से करने का विधु ने विरोध किया था।
     ‘‘तुम इन घुमक्कड़ बच्चों के गाने की परफारमेन्स पर इनका उत्साहबर्द्धन नहीं करना चाहती हो तो मत करो, पर इन्हें भिखारी मत कहो। मैंने इन्हें पांच रुपये देकर न तो घर लुटा दिया है और न इनको महिमा मण्डित कर दिया है। मुझे उनका गाना अच्छा लगा, सो प्रोत्साहन के तौर पर कुछ दे दिया। कभी सोचकर देखो, कितना प्यारा गाते हैं दोनों! घंटे-दो घंटे अपनी कला का प्रदर्शन करके ये कुछ कमा लेते हैं तो क्या गलत करते हैं? इनका बाप नहीं है, मां घरों में चौका-बर्तन करती है। इतना नहीं कमा पाती कि दो वक्त की दाल-रोटी के बाद इन्हें पढ़ा-लिखा सके। अपनी पढ़ाई का खर्चा ये अपनी कला की परफारमेन्स देकर निकालते हैं। 
     हो सकता है वे टी.वी. आर्टिस्ट कला को समृद्ध कर रहे हों, पर इन्हें कुछ देना भीख है तो उनकी परफारमेन्सेज को एप्रीसिएट करने के लिए तुम रोज मेसेजों पर बीस-तीस रुपये खर्च देती हो, वह क्या? उनको वोट/सपोर्ट करना कोई निशुल्क तो नहीं है। मैंने तो तुम्हें कभी नहीं टोका। परफारमेंस के बाद ये कुछ मांगते हैं तो वे भी कुछ मांगते हैं।
    विधु के द्वारा मेसेजों पर बीस-तीस रुपये खर्च कर देने की बात उसे चुभ गई थी। उसे लगा था जैसे विधु ने उसके एन्ज्वायमेंट पर फिजूलखर्ची का कमेन्ट कर दिया हो। पर शायद उसकी बात समझने का मेरा एंगिल गलत था। उसने तो अपनी बात समझाने के लिए दोनों स्थितियों में तुलना भर की थी। पर उसके कहने के ढंग में तीखापन भी तो बहुत था। वह प्यार से भी अपनी बात कह सकता था। पर तीखापन तो मेरी बात में भी कम नहीं था। फिर मैं इस बात पर उससे कई बार पहले भी उलझ चुकी हूँ। शायद उसका तीखापन इसी की प्रतिक्रिया रहा हो। जो भी हो...मुझे विद्यु को सॉरी....।
    और निशा ने करवट बदला। अपना एक हाथ विधु के शरीर पर रखा और धीरे से बोली, ‘‘सॉरी यार! अब माफ भी कर दो.... गलती हो गई...।

Saturday, May 5, 2012


डा. उमेश महादोषी 


दो लघुकथाएं 


पब्लिक सेवा



   मैं अपने केबिन में बैठा चार्ज टेकिंग रिपोर्ट को अन्तिम रूप दे रहा था कि हॉल में जोर-जोर से बोलने की आवाज मेरे कानों में पड़ी। हाल प्रबन्धक मि0 सक्सेना से एक कस्टमर, मि0 अरोड़ा उलझे हुए थे।
   ‘मुझे कनेक्टीविटी-वनेक्टीविटी से कुछ नहीं लेना-देना। मेरा पेमेन्ट तुरन्त करवाओ, मैं और इन्तजार नहीं कर सकता।‘
    ‘...देखिए अरोड़ा जी, मैंने कनेक्टीविटी न होने की कम्प्लेन्ट नोट करा दी है। आप कुछ मिनट इन्तजार कर लीजिए,
कनेक्टीविटी आते ही आपके चैक का पेमेन्ट करवा दूंगा।’
    ‘कनेक्टीविटी तो काम न करने का बहाना है। कनेक्टीविटी नहीं होगी, तो क्या बैंक बन्द कर दोगे?.....हकीकत तो यह है कि तुम लोग काम करना ही नहीं चहते हो। जब बिना कुछ किए तनखाह मिले, तो क्या जरूरत है काम करने की!...’
   ‘अरोड़ा जी, आप थोड़ा धैर्य रखिए। मुझे अपशब्द कहने से आपकी समस्या का समाधान नहीं हो जायेगा। ये तकनीकी समस्या है, समझने की कोशिश करिए। हम आपका काम करने के लिए ही बैठे हैं, पर कनेक्टीविटी का न होना हमारे स्तर से परे है।....’
    ‘इतना समय नहीं है मेरे पास।..... तुम लोगों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाये, तो पता चले। कोई दो रुपये की नौकरी भी नहीं देगा तुम जैसे नाकाराओं को........’ कहते हुए मि0 अरोड़ा पैर पटक कर जाने लगे। 
   मैंने इस प्रकरण को ध्यानपूर्वक देखा-सुना। मि0 सक्सेना का धैर्य और मि0 अरोड़ा की बेहूदगी ने मुझे एकबारगी अनियन्त्रित-सा कर दिया, पर पद की गरिमा और जिम्मेवारी के अहसास से मैंने अपने-आपको नियन्त्रित किया। चपरासी को कहकर मि0 अरोड़ा को अपने केबिन में बुलाया। मेरे केबिन में आते हुए भी मि0 अरोड़ा अपनी बेहूदगी का इजहार करने के लिए उताबले हो रहे थे, पर मेरे द्वारा शान्तिपूर्वक बैठकर बात करने के दृढ़ता भरे संकेत से शायद उन्होंने अपने-आप पर नियन्त्रण किया। इतने में मेरा इशारा पाकर चपरासी एक गिलास पानी ले आया, जिसे आफर किए जाने पर मि0 अरोड़ा ने पी लिया।
   ‘....आपने मुझे पहचाना?’
    मेरे प्रश्न पर मि0 अरोड़ा ने हल्का-सा गच्चा खाया, फिर अपनी अकड़ को कुछ बरकरार और कुछ नियन्त्रित-सा करते हुए बोले- ‘...आप नए शाखा प्रबन्धक हैं शायद!’
    ‘...मेरा मतलब है कि.... हम पहले भी मिल चुके हैं?’
    ‘....जी, मुझे तो कुछ याद नहीं आ रहा.... आप तो अभी एकाद सप्ताह में ही आए हैं?’
    ‘कोई बात नहीं, मैं याद दिला दूंगा। पहले उस समस्या पर कुछ बात कर ली जाए, जिसकी बजह से आप इतना अधिक नाराज हो रहे हैं कि सामान्य शिष्टाचार भी भूल गए। एक बात बताइए, यदि आपको किसी व्यक्ति से अर्जेंट बात करनी हो और आपके मोबाइल से लाइन न मिले, तो आप क्या करेंगे?’
    ‘लाइन मिलने तक ट्राई करूंगा। पर टेलीफोन करने और पैसे निकालने में फर्क होता है!’
    ‘बात तकनीकी सिचुएशन की हो, तो टेलीफोन और बैंक की कनेक्टीविटी में कोई फर्क नहीं होता। सक्सेना जी ने आपके साथ न तो कोई दुर्व्यवहार किया है और न हीं जानबूझकर आपको परेशान किया है। तकनीकी फाल्ट हम सबकी साझा समस्या है। आपको परेशानी हो रही है, हम जानते हैं, पर परेशानी हमें भी होती है। हालांकि आपके सामने एटीएम का विकल्प भी है, पर वहां भी कुछ समस्या हो सकती है, दूसरे इसके लिए हम आपको विवश नहीं कर सकते। लेकिन किसी भी समस्या का समाधान अपने और दूसरे- दोनों के पक्षों को समझकर ही किया जा सकता है।’
   ‘पर, ये तो आपकी आन्तरिक समस्या है। हमें क्या लेना-देना इससे?’
   ‘सिर्फ हमारी नहीे, पूरे सिस्टम की समस्या है जनाब! हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। फिर भी शिकायत करना और किसी शरीफ व्यक्ति का अपमान करना दो अलग-अलग बाते हैं। आप याद करिए, कल कुछ जरूरी दवाइयां लेने मैं आपकी दुकान पर गया था। आप किसी व्यक्ति से टेलीफोन पर व्यक्तिगत बातें कर रहे थे। मैं दस मिनट तक खड़ा रहा, बीच-बीच में आपसे दवाइयां देने के लिए रिक्वेस्ट करता रहा, पर आपने मेरी बात को ठीक से सुनना तक उचित नहीं समझा। जब मैंने जल्दी में होने की दुहाई दी तो आपने दो-टूक कह दिया- ‘ज्यादा जल्दी में हो तो कहीं और से ले लो।’
   मैंने फिर दूसरा स्टोर दूर होने और मरीज को जल्दी दवा दिए जाने की जरूरत आपको बतानी चाही तो आपने बेहद बेरुखी से कह दिया- ‘मैंने आपकी परेशानी को समझने का कोई ठेका नहीं ले रखा है!’ जबकि आप चाहते तो इतनी देर में बातें करते-करते मुझे दवाइयां दे सकते थे। क्या आप समझ सकते हैं कि उस वक्त आपका व्यवहार कितना गलत था और इस वक्त भी?.....
   ‘मेरी बात अलग है, मैनेजर साहब। मैं एक प्राइवेट मेडीकल स्टोर का मालिक हूँ और आप यहाँ एक सार्वजनिक संस्था में नौकरी करते हैं। आप हमारी सेवा के लिए बैठे हैं....बदला लेने के लिए नहीं!’ मि0 अरोड़ा अपना दम्भ छोड़ने को तैयार नहीं थे।
   इस बीच कनेक्टीविटी आ चुकी थी, और मेरे इशारे के अनुसार मि0 सक्सेना मि0 अरोड़ा का पेमेन्ट चपरासी के हाथों मेरे पास भिजवा चुके थे। मैंने पेमेन्ट मि0 अरोड़ा को पकड़ाते हुए कहा- ‘आपका काम हो चुका है क्योंकि हम यहाँ काम करने के लिए बैठे हैं। पर यह बात आप भूल जाइए कि आप एक प्राइवेट स्टोर के मालिक हैं। आप भी पब्लिक की सेवा के लिए उसी तरह बैठे हैं, जैसे हम बैठे हैं। बल्कि यहां आपको जो असुविधा हुई, वह हमारे नियन्त्रण से बाहर के कारण से हुई, पर आपने जो असुविधा मुझे  पहुंचाई थी, वह आपने जान-बूझकर अपने विवेक का गलत प्रयोग करके पहुंचाई। मैं आपसे बड़ी जरूरत में था, मैंने इसके बावजूद गुस्सा जाहिर नहीं किया, पर आपने......! रही बात बदले की, मैंने आपसे जो कुछ कहा वह बदला लेने या आपके व्यवहार के प्रति नाराजगी दिखाने के लिए नहीं कहा है। हम आपको सिर्फ इतना समझाना चाहते हैं कि जिम्मेदारी की भावना हर व्यक्ति के अन्दर होनी चाहिए। जिस समस्या के कारण आपको बैंक में परेशानी हुई, उसके समाधान के साथ बहुत सारे लोग जुड़े हैं और तकनीक भी। हर सिस्टम लोगों से मिलकर बनता है और एक दूसरे को समझने एवं व्यवहार से चलता है। हमारे लिए आप बेहद महत्वपूर्ण हैं, पर आपसे रिक्वेस्ट है कि व्यवहार और पब्लिक सेवा के अर्थ को उसके सही रूप में समझिए।...’ कहते हुए मैंने अपनी सीट से उठते हुए उन्हें भी अप्रत्यक्षतः जाने का विनम्र संकेत कर दिया था। 




चने वाला


   ‘‘आज तो बहुत बुरा फंसा।..... जिन्दगी में दुबारा इतनी भीड़ भरे ट्रेन के डिब्बे में नहीं चढ़ूँगा। स्लीपर क्लास में पेनाल्टी लगती, पर कम से कम खड़े होने और सांस लेने की जगह तो मिल जाती!.......’’। सवारियों से बुरी तरह ढुंसे ट्रेन के सामान्य डिब्बे में घुस आने के पश्चाताप और भयंकर परेशानी से पीड़ित मैं अपने-आपको कोस रहा था। इतनी भीड़ आज से पहले मैंने कभी नहीं देखी थी। एक-दूसरे के पैरों को कुचलते-कुचलवाते लोग एक दूसरे के साथ धक्का-मुक्की करते और गुस्से से लाल-पीले होते अपने-अपने पैर टिकाने की जगह पाने के लिए पसीना बहा रहे थे। मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बनकर कभी अपने-आपको कोसता, कभी अपनी भड़ास दूसरों पर निकालता। किसी तरह किसी एक के पैर के नीचे से अपना एक पैर निकाल पाता, तब तक किन्ही दूसरे महानुभाव का कोई पैर मेरे दूसरे पैर का भुर्ता बनाने पर उतर आता। कभी किसी की बद्बू-भरी सांस मेरे नथुनों के साथ जबरदस्ती करने लगती तो कभी किसी की जुराबों से निकली भड़कीली बू दिमांग की नसों को फाड़ने पर उतारू हो जाती। आज तो सचमुच बहुत बुरा फंस गया था।
   अचानक गेट के सामने वाली गैलरी की ओर से जोर-जबरदस्ती और झड़पों से मिश्रित शोर ने ध्यान खींचा। एक पच्चीस-छब्बीस वर्ष का लड़का, जिसकी एक टांग लकवा या ऐसी ही किसी बीमारी से ग्रस्त होने के कारण निष्क्रिय थी, लोगों से उलझता-झिड़कता एक लाठी के सहारे जगह बनाता हमारी ओर बढ़ा आ रहा था। बड़ी कुशलता के साथ अपनी लाठी कहीं भी भीड़ में घुसाकर किसी ऊपरी वर्थ के साथ टिका देता, फिर बड़ी-बड़ी तनियों के सहारे गले में लटकाए बड़े और भारी से थैले को बैलेंस-सा करता हुआ लाठी के साथ पैर टिकाता और ऊपरी वर्थों का तिनका-सा सहारा लेता हुआ आगे बढ़ता। जल्दी ही वह मेरे करीब आ पहुंचा। गजब की फुर्ती से उसने मेरे आस-पास के दो-तीन लोगों को हिला-डुलाकर थोड़ी-सी जगह बनाई, लाठी का निचला सिरा सामने वाली वर्थ के साथ और ऊपरी सिरा डिब्बे की दीवार से खिड़की के पास टिकाया और लाठी के सहारे लटका हुआ सा स्थिर हो गया। थैले को घुटनों पर रखकर हल्का-सा खोला और जोर की एक आवाज लगाई- ‘‘करारे-भुने मसालेदार चने......। स्वाद न हो तो पैसे वापस।..... एक बार खाओगे तो बार-बार चाहोगे.....।’’ 
   ‘‘बाप रे! इतनी भीड़ में एक लाठी के सहारे, विकलांग होने के बावजूद कितनी फुर्ती से अपनी दुकान जमा ली इसने तो!’’ मैं मन ही मन उसकी फुर्ती, साहस और प्रबन्धकीय कौशल से हक्का-बक्का बुदबुदाया। जो लोग उसके इस तरह भीड़ में घुस आने से कोफ्त महसूस कर रहे थे, देखते-देखते वे ही लोग उसके चनों के एक-एक पैकेट के लिए टूट-से पड़ रहे थे। भरी भीड़ के कारण मिली पीड़ा को सब लोग किस तरह से भूलकर चनों के स्वाद में खो रहे थे! मैं उससे अपनी तुलना में खोने लगा- ‘कहां यह और कहां मैं! भीड़ से थोड़ी-सी पीड़ा क्या मिली कि मैं तिलमिला गया, और यह? किस अदम्य साहस से अपनी रोजी-रोटी बिना किसी गिले शिकवे के कमा रहा है....’’।
   तभी पास में खड़े एक महाशय, जो शायद उसके पसीने से आ रही बदबू से परेशान होने लगे थे, खिशियाकर बोल पड़े- ’एक तो इतनी भीड़, सांस लेना तक दूभर हो रहा है, ऊपर से ये भिखमंगा जाने कहां से घुस आया!’
   ‘‘.....ऐ बाबू साहब! चने नहीं खाने हैं तो मत खाइए, पर बात जरा तमीज से करिए। मैं भिखमंगा नहीं हूूँ और नहीं किसी के साथ जोर-जबरदस्ती कर रहा हूँ। गरीब हूँ, पर अपनी रोजी-रोटी मेहनत करके कमा रहा हूँ।...’’
   अब तक वह चालीसेक पैकेट बेचकर दो सौ रुपये के करीब की बिक्री करके आगे बढ़ने को तैयार था। मैं उन महाशय को दिये उसके शालीन लेकिन दृढ़ जवाब से खुश था। मेरी दृष्टि उसकी लाठी, उसकी लकवाग्रस्त-सी टांग और उसके चेहरे पर बार-बार फिसल रही थी। उसने शायद मेरी मनःस्थिति को कुछ भांप लिया, बोला- ‘‘क्या हुआ बाबू जी?’’
   ‘‘कुछ नहीं.....’’। मेरे मुंह से निकला, पर जैसे मैंने खुद ही अपने शब्दों को नहीं सुना। अनायास एक हाथ से जेब से पाँच का सिक्का निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिया। वह चने का पैकेट देकर आगे बढने लगा। उस भीड़ भरे डिब्बे में किसी प्रकार मैं चने के दाने मुँह में डालने लगा लेकिन मेरी आंखें लगातार उसकी लाठी और फुर्तीलेपन का पीछा कर रही थीं। गोया जीवन का एक नया दर्शन मेरी चेतना में कहीं कोंध रहा था।

Friday, September 9, 2011

चौकीदार

   किचन से बर्तनों के खड़कने की आवाज सुनकर मेरी नींद खुल गयी। घड़ी पर नजर डाली तो साढ़े पांच बजे थे।......गार्गी जल्दी उठ गयी?.....पर किचन में इतनी जल्दी जाने की क्या जरूरत.....! मैं उठा और सीधा किचन में..... ‘क्या हुआ? करीब पौना घंटा पहले ही उठ गईं और चाय भी अभी से......?’
   ‘हाँ, करीब तीन बजे बाथरूम जाने को उठी थी, बस उसके बाद नींद आई ही नहीं। सिर कुछ भारी सा लगने लगा, तो सोचा चाय पीकर शायद कुछ आराम हो जाये..... बस!’
   ‘लगता है आज फिर कोई टेंशन पाल लिया।.... तुम क्यों इतना अधिक सेन्सेटिव होती जा रही हो? कैसे चलेगा इस उम्र में? भई अब निश्चिन्त होकर आराम से गुजारने के दिन आये तो तुम अनावश्यक चिन्ताओं में खोने लगी हो?’ खैर आज हम जल्दी उठ ही गये हैं, तो चाय पीकर आज जल्दी ही निकलते हैं। आज की मॉर्निग वाक में थोड़ा लांग डिस्टेंस कवर करेंगे, केन्ट की ओर निकलेंगे आज हम!’
   ‘ठीक है, पर आज पहली तारीख है, वो वेचारा चौकीदार आयेगा पैसे मांगने। आज आप मना नहीं करेंगे? हमें रिटयरमेन्ट के बाद इस अपने घर में आये तीन महीने हो गये, आपने एक बार भी उसे पैसे नहीं दिए। आज तीनों माह के 50 रुपये के हिसाब से डेढ़ सौ रुपये उसको आपने देने ही होंगे। आज मैं आपके मुँह से ना या उसके लिए डाँट-डपट हरगिज नहीं सुनूँगी।....पता नहीं क्यों मुझे लग रहा है.... वह बेचारा बेहद जरूरतमन्द है। पूरी जिन्दगी न जाने आपने कितने जरूरतमन्दों की मदद की, इस बेचारे गरीब चौकीदार को थोड़े से पैसे देने में आप पचासों बाते उसे कह चुके, पर फूटी कौड़ी उसके हाथ पर नहीं रखी!’ कहते हुए गार्गी दो कपों में छानी हुई चाय और अपने परेशान चेहरे को लिए लॉबी में पड़ी टेबल की ओर बढ़ गई।
   ‘... फिर वही चौकीदार का रोना.......’ मैं उसके पीछे आते हुए लगभग झल्लाई आवाज में बोला।
   ‘नहीं मैं अब आपकी एक नहीं सुनूँगी, आपके हर सवाल का जवाब मिल चुका है। पुलिस वैरीफिकेशन इसलिए नहीं हुआ, कि पुलिस उस गरीब की सुनती नहीं। उन्हें उस गरीब से भी दो-तीन सौ रुपये चाहिए। उसके पास अपना गाँव का राशनकार्ड तो है ही, आप ही मोहल्ले के कुछ लोगों को लेकर क्यों नहीं थाने चले जाते हैं, बैंक में बड़े अफसर रहे हो, पुलिस कुछ तो सुनेगी आपकी? मोहल्ले में किसने उसे रखा है, कौन-कौन उसे पैसे देता है..... तो जैसे आप सोचते हो, अधिकांश वैसा ही सोचने वाले लोग हैं इस मोहल्ले में। जोशी जी की बात पच्चीस-तीस परिवार मानते हैं मोहल्ले में, कृष्णपाल जी की पैठ भी बीसेक परिवारों में है और ये दोनों ही लोग आपकी इज्जत करते हैं। आप ही क्यों नहीं इनसे मिलकर चौकीदार का एक सिस्टम बनाने की पहल कर देते हो? बाकी मोहल्ले वाले भी कोशिश करने पर जुड़ ही जायेंगे! उस गरीब का भला हो जायेगा और मोहल्ले को भी एक ईमानदार चौकीदार मिल जायेगा।’ चाय पीते हुए गार्गी बोली थी।
   ‘पर यह रेगुलर तो आता नहीं है, जब पैसे लेने होते हैं तो चार-पांच दिन घूम जाता है। कौन इसके पचड़े में पड़े! फिर हमारी कालौनी तो वैसे भी सेफ है, गाँव से आये कई धाकड़ लोग रहते हैं इसमें। सात-आठ साल तो हमें हो गये मकान बनाए, कोई दुर्घटना घटते सुना कभी इस कालौनी में?’ मैंने चाय सिप करते हुए गार्गी को समझाना चाहा।
  ‘रेगूलर न होना उसकी मजबूरी भी तो हो सकती है। सौ परिवारों के मोहल्ले में से दस लोग भी पैसे नहीं देते हैं। ऐसे में हो सकता है कि कई मोहल्लों में कुछ-कुछ दिन गस्त करता हो। हो सकता है दिन में भी थोड़ा बहुत कुछ और काम भी करता हो, इसलिए एक-दो दिन की छुट्टी कर जाता हो, आखिर कभी-कभी नींद पूरी करना भी तो जरूरी है। रही बात कालोनी के सेफ होने की, सो कालोनी की छोड़ो, आज के समय में संसद भी सेफ नहीं है। मैं तो कहती हूँ चौकीदार के साथ मोहल्ले वालों को कुछ ऐसा सिस्टम भी बनाना चाहिए कि चौकीदार शोर मचाये, तो उसके शोर पर लोगों की कुछ प्रतिक्रिया भी आ सके।’ गार्गी के तर्क भावुकता में पगे हुए थे।
   ‘पर तुम यह कैसे कह सकती हो कि यह चौकीदार ईमानदार है! इन चौकीदारों का कोई भरोसा नहीं होता? आवास विकास में श्रवण भाई के परिवार के साथ जो उस रात हुआ, वो तो तुम जानती ही हो! उस रात जब उन्हें कहीं बाहर जाना था, तो गेट बन्द करने से पहले मिले हल्के से मौके का फायदा उठाकर चौकीदार किस तरह घर में छुप गया और उनके जाते ही......! वो तो अच्छा हुआ कि कुछ सामान भूल गये थे श्रवण जी, सो स्टेशन के रास्ते से ही लौटना पड़ा और उन्होंने भाभी जी को बचा लिया। भागते-भागते वह चौकीदार उन श्रवण जी को भी दो लाठियां जमा गया था, जो हर महीने उसे तय साठ की जगह सौ रुपये का नोट थमा देते थे!
   ‘हाँ, पर दोनों के चेहरों को देखकर अन्तर किया जा सकता है। आपने तो हजारों लोगों से डील किया है, और चेहरा देखकर इन्सान की पहचान के दावे करते रहे हो? फिर वह तो पुलिस से वैरीफाइड भी था.... क्या हुआ, बस जेल ही तो हुई उसे? पुलिस वैरीफिकेशन से चरित्र तो वैरीफाई नहीं हुआ उसका? अपने सुयोग को परिचय के अभाव में कानपुर में रूम ढूंढ़ने में कितनी परेशानी हुई थी। एक चाय वाले ने चेहरे पर विश्वास करके ही तो उसकी मदद की थी! मैं पूरे विश्वास से कह सकती हूँ यह लड़का वैसा चौकीदार नहीं है, वल्कि मुझे तो वक्त का मारा लगता है। इस पर विश्वास किया जा सकता है। मैं सिस्टम को बाईपास करने की बात नहीं कह रही हूँ। उसके बारे में पता करो, अपने को सन्तुष्ट करो, पर उसकी मदद करो। वैसे भी महीने में पचास रुपये देकर लुट तो नहीं जायेंगे हम! आज तो मुझे बड़ी घबराहट हो रही है, ईश्वर न करे वह किसी बड़ी परेशानी में हो, कहीं उसका बच्चा बीमा....!’
   ‘ऐसा क्यों लग रहा है तुम्हें?
   ‘वह जिस दिन भी गश्त पर आता है, सुबह साढ़े चार-पांच बजे तक चक्कर लगाता है। पर आज तीन बजे से मेरी आंख खुली है, तबसे मैंने उसका खड़का नहीं सुना।’ कहते-कहते गार्गी का गला भरने सा लगा था।
   तभी हमारे घर की कालवेल बजी। मैंने उठकर दरवाजा खोला, बाहर पड़ौसी मदनजी का बेटा अनुराग था, जो सुबह-सुबह जोगिंग पर जाया करता था.... लग रहा था दौड़कर आ रहा है..... हाँफता हुआ सा बोला, ‘अन्कल आपने सुना, हमारे मोहल्ले के चौकीदार की तीन नम्बर गली में चोरों ने हत्या कर दी। उस गली में वो त्रिखा जी रहते हैं न, वो लोग कहीं बाहर गये हुए हैं, कल रात उनके घर में चोर घुस आये, चौकीदार ने देख लिया। उसने आस-पास के कई घरों के लोगों को जगाने की कोशिश की पर कोई निकला ही नहीं। तब उसने शोर मचाया जिसे सुनकर चोर बिना चोरी किए भाग तो गये लेकिन भागते-भगते उसके सीने पर चाकू से वार कर गये। वो वेचारा दो दिन से भूखा था, सो कमजोरी की वजह से भागकर अपना बचाव नहीं कर सका। वहीं गली नं. तीन में उसकी लाश पड़ी है। पुलिस आ गई है। उसकी बीबी के साथ चार-पाँच साल की बच्ची है। दहाड़ें मारकर रो रही है। उसके पास तो दाह-संस्कार लाइक पैसे भी नहीं हैं। अंकल सब लोग मिलकर उसकी मदद कीजिए न!......’ वह एक सांस में ही सब कुछ कहकर मेरी ओर देखने लगा।
   मैंने पीछे मुड़कर देखा मेरी पत्नी गार्गी फर्श पर बेहोश पड़ी थी। शायद उसने अनुराग की सारी बात सुन ली थी। 

Saturday, August 6, 2011

डा. उमेश महादोषी की तीन लघुकथाएं
 भू-मण्डल की यात्रा   
हरीचन्द जी ने जैसे-तैसे साल भर से बन्द पड़े मौके-बेमौके काम आ जाने वाले छोटे से पैत्रिक घर का दरवाजा खोला। एक कोने में पड़े पुराने झाड़ू से जाले और फर्श को किसी तरह थोड़ा-बहुत साफ किया, पुराने सन्दूक से पुरानी सी चादर ढूँढ़कर फर्श पर बिछायी, और लेट गये। आज शरीर ही नहीं, उनका मन भी पूरी तरह टूटा हुआ था। नींद आने का सवाल ही कहां था, किसी तरह बेचैनी को सीने में दबाकर आँखे मूँद लीं। एक-एक कर जिन्दगी की किताब के पन्ने खुद-ब-खुद पलटते चले गये...।
    बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद कितनी मेहनत करके पाई-पाई जोड़कर उन्होंने वह सुन्दर-सा घर बनाया था, एक दुकान भी कस्बे के मेन बाजार में खरीदकर अपना कारोबार जमाया था। बेटे अर्जुन को भी बी.टेक. की शिक्षा दिलवा ही दी थी। ग्रहस्थी की पटरी लाइन पर आने के साथ थोड़े सुख-सुकून के दिन आये ही थे, कि पत्नी उर्मिला दुनियां से विदा हो गई। उसके जाते ही जैसे उनकी दुनियां उजड़ने लगी। छः माह भी न हुए थे कि अर्जुन ने लन्दन से एम.एस. करने की जिद ठान ली थी। बहुत समझाया था उसे- ‘बेटा तू इतनी दूर परदेश में होगा, जरूरत पड़ने पर किसे तू याद करेगा और किसे मैं। यहां अपने देश में कम से कम एक-दूसरे का सहारा तो है। फिर आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं है कि विदेश का खर्चा वहन किया जा सके....। पर बेटे के तर्को के आगे वह विवश हो गये थे- ‘पापा कैसी बातें करते हो आप! आज जितनी देर हमें अपने प्रदेश की राजधानी पहुँचने में लगती है, उससे कम समय में लन्दन पहुँचा जा सकता है। आज सारी दुनियां सिमिटकर छोटा सा गांव बन गई है। रोज हम आपस में टेलीफोन पर बात कर लिया करेंगे। जरूरत पड़ने पर कितनी देर लगेगी यहां आने में। रही बात पैसों की, तो आपके अकेले के रहने के लिए पुराना घर काफी है। इस नये घर को बेच देते हैं, अच्छी खासी रकम की व्यवस्था हो जायेगी। फिर मैं वहां कोई पार्ट टाइम जॉब भी कर लूँगा। दो साल के बाद तो मुझे अच्छा और स्थाई जॉब मिल ही जायेगा, तब आप भी वहीं हमारे साथ रहेंगे। क्या जरूरत रहेगी इस छोटी-मोटी दुकानदारी की? आप तो पूरे भू-मण्डल की यात्रा करना....’। और हुआ भी वही, मकान बेचा और बेटे ने सीधे लन्दन का टिकिट.....।
    पूरे दो साल बाद एक दिन अचानक अर्जुन भारत यानी पापा के पास आया। ‘पापा मुझे लन्दन में ही एक बड़ी कम्पनी में बहुत अच्छी स्थाई नौकरी मिल गई है। आपको भी मेरे साथ ही चलना होगा। वहां मैंने एक फ्लैट भी देख लिया है, उसके लिए थोड़े पैसों की जरूरत भी है। अब आपको दुकानदारी की जरूरत तो रही नहीं और यहाँ इण्डिया में हमें आना भी नहीं है, इसलिए दुकान और पुराना घर भी बेच दो। इससे फ्लैट के लिए जरूरी पैसों की व्यवस्था हो जायेगी। फ्लैट रूबिया को बेहद पसन्द आया है, आपको भी अच्छा लगेगा.....।’
   झटका ता लगा था, पर जैसे-तैसे अपने-आपको सम्हालकर पूछा था- ‘ये रूबिया कौन है, कहां की रहने वाली है, क्या करती है और तेरा क्या रिश्ता है उससे?’
   ‘पापा, वो मेरी कम्पनी में ही जॉब करती है। रहने वाली पाकिस्तान की है। हम दोनों एक दूसरे को बहुत पसन्द करते हैं, आपको भी अच्छी लगेगी। आपके वहाँ चलते ही हम शादी कर लंेगे......।’ तब भी कितना समझाया था- ‘बेटा तू अपनी नौकरी कर और मुझे यहीं मेरे वतन में रहने दे। फ्लैट साल-दो साल बाद भी तू ले सकता है। जहाँ तक बात बेटा एक पाकिस्तानी लड़की से शादी करने की है, सो यह ठीक नहीं रहेगा। अलग-अलग धर्मों का होने पर एक बार निर्वाह हो भी जाये, पर साथ में तुम दोनों का सम्बन्ध दो अलग-अलग ऐसे देशों से है, जिनकी पारस्परिक विरोध की जड़ें बहुत गहरी हैं। और दोनों देशों के निवासियों की अपने-अपने देश के साथ आस्थाएं और भावनाएं भी उतनी ही गहरी हैं। इसलिए तुम दोनों और दोनों के पारिवारिक जनों के बीच ऐसे बहुत सारे मौके आ सकते हैं, जब जाने-अनजाने इन आस्थाओं और भावनाओं के चलते एक-दूसरे को समझना और सहन कर पाना असम्भव हो जायेगा। इसलिए मेरी सलाह यही है कि एक-दूसरे के प्रति भावनात्मक लगाव को सिर्फ दोस्ती तक ही रहने दो....।’
    पर अर्जुन कहाँ सुनने वाला था। ‘पापा, फिर वहीं घिसी-पिटी बातें लेकर बैठ गये। दुनियां बहुत बदल गई है, आज हम देशों की सीमाओं से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। न रूबिया पाकिस्तान की बन्धुआ है और न मैं हिन्दुस्तान का। पापा आप भी इन संकुचित सीमाओं से ऊपर उठ जाओ। हमारा देश पूरी दुनियां है........।’ लम्बा सा भाषण दे डाला था, अर्जुन ने। हरीचन्द जी की एक न चली, किसी प्रकार बेटे को समझा-बुझा कर इस पैत्रिक मकान को न बेचने पर ही राजी कर पाये थे। दुकान पड़ोसी लाला भीम सिंह जी को बेची और फिर वही हुआ, जो बेटे ने चाहा। एक साल भी नहीं बीता, कि परसों वो निष्ठुर दिन भी हकीकत बनकर सामने आ गया, जिसकी आशंका वह व्यक्त कर चुके थे।
    अर्जुन के दोस्त वरुण के पापा हरेन्द्र जी घर आये थे उनसे मिलने। हमवतन और हमउम्र से मिलकर बातों में दोनों भूल ही गये कि वे लन्दन मंे बैठे हैं। उसी दिन दुर्भाग्य से आतंकियो ने मुम्बई पर हमला कर दिया। इस हमले की खबर टी.वी. पर देखी-सुनी तो चर्चा का बिषय बदल गया। चर्चा के बीच में पाकिस्तान और उसकी पाकिस्तानियत कब आ गई, पता ही नहीं चला। यह भी याद नहीं रहा कि घर में पाकिस्तानी बहू बैठी है। हरेन्द्र जी के घर में रहते हुए तो कुछ नहीं हुआ, पर उनके जाते ही क्या कुछ नहीं हुआ....! ‘मेरे घर में रहकर मेरे ही ऊपर अविश्वास करते हो? यदि विश्वास नहीं था तो शादी क्यों की थी बेटे के संग? बुड्ढे अब मैं तुझे एक दिन भी नहीं रुकने दूँगी यहाँ.....।‘ तमाम मिन्नतों के बावजूद बहू ने अर्जुन के दो दिन बाद आफीशियल टूर से लौटने तक भी घर में नहीं रूकने दिया। एजेन्सी से एयर टिकिट मंगाकर हवाई जहाज में बैठाते हुए उसने एक बार भी नहीं सोचा कि ये इस उम्र में भारत जाकर भी किसके सहारे और कैसे अपना जीवन बसर करेगा.......! सोचते और आँसू बहाते हरीचन्द जी की आँख कब लग गई, पता ही नहीं चला। और जब आँख खुली तब अगले दिन का सूरज भी सिर चढ़ रहा था।
  थोड़ी देर के लिए वह फिर उन्हीं विचारों में खोने लगे। पर अचानक उन्होंने अपने आँसू पोंछ डाले, ‘बहुत मान ली बेटे की जिद। अब और नहीं....! जीविका का अपना कोई साधन नहीं है तो क्या, लाला भीम सिंह जी से मिलूँगा, भले आदमी हैं, अपनी दुकान पर सेल्स मेन तो रख ही लेंगे।....न...नहीं, जिस दुकान का मालिक था, उस पर नौकर.... अरे! काहे की शर्मिन्दगी.... भू-मण्डल की यात्रा की इतनी कीमत तो......!’
भू-मण्डल के स्वामी
   ‘नहीं सर, इतने सम्वेदनशील विषय पर मैं किसी विदेशी विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी की सलाह नहीं दे सकता। सर मेरा अनुमान है कि इससे हमारे विश्वविद्यालय ही नहीं, देश को भी भविष्य में नुकसान हो सकता है। प्रो. जयेन्द्र और प्रो. नारंग जैसी प्रतिभाओं का हमें बहुत सोच समझकर और देश के हित में उपयोग करने की रणनीति बनानी चाहिए। मैं उन दोनों के बिषयों कम्प्यूटर विज्ञान और न्यूक्लियर विज्ञान के समन्वय से एक नया कोर्स तैयार करने और उसे अपने विश्वविद्यालय में चलाने के आपके विचार से उत्साहित हूँ और उसका पूरा समर्थन भी करता हूँ। पर सर, मेरा मानना है कि हमारे ये दोनों युवा प्रोफेसर्स किसी भी विदेशी प्रोफेसर से इस नए बिषय पर कहीं ज्यादा सक्षम सिद्ध होंगे।’ प्रति-उपकुलपति प्रो. सिन्हा ने अपनी दलील उपकुलपति प्रो. राठौर के सामने रखी। प्रो. राठौर ने एक बार सोचा और प्रो. सिन्हा को समझाते हुए बोले- ‘सिन्हा जी, आपने अपनी स्पष्ट राय मेरे सामने रखी, मुझे अच्छा लगा। पर यह प्रोग्रेसिव नजरिया नहीं है। आज के ग्लोबलाइजेशन के जमाने में इतना क्लोज्ड दायरे बनाकर नहीं चला जा सकता। कुछ रिस्क भी लेने ही पड़ते हैं। फिर हमारे मैनेजमेन्ट और केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री महोदय की भी यही इच्छा है कि इस बिषय पर हमें उनके द्वारा प्रस्तावित विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी करनी ही चाहिए। कुछ फायदा उनसे हमारे विश्वविद्यालय और देश को होगा, तो कुछ फायदा तो दूसरा पक्ष भी उठायेगा ही। हमारे दोनों प्राफेसर्स प्रतिभाशाली हैं, उनके काम से ही हमारे नीलमणि विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनी है, पर अभी भी हमारा भावी साझेदार विदेशी विश्वविद्यालय और उसके प्रोफेसर्स हमसे बहुत आगे हैं। फिर इस पी.जी. कोर्स के लिए निर्धारित चौबीस माह में से पहले इक्कीस माह तो हमारे ही पास हैं। हमारी डिग्री के आधार पर ही मात्र तीन माह का अन्तिम प्रशिक्षण और प्रोजेक्ट वर्क ही तो विदेश में होना है।’
   ‘सर, यह भी तो एक बेहद अटपटा सा नियम बनाया जा रहा है। ऐसा कहीं होता है कि एक विश्वविद्यालय की प्रदत्त डिग्री पर अन्तिम मोहर कोई दूसरा विश्वविद्यालय लगाये? मुझे तो इसमें एक गहरी साजिश नजर आ रही है।’
   ‘क्या सिन्हा, तुम भी ऊलजलूल बातें सोचते रहते हो, स्पेशल कोर्स के लिए मैनेजमेन्ट और सरकार कोई स्पेशल प्रावधान रखना चाहती है, तो तुम्हें इसमें साजिश नजर आने लगी! जब कोई नया नियम पहली बार बनता है, तो हमेशा ऐसा ही होता है। अब आप प्रो. जयेन्द्र और प्रो. नारंग के साथ हम दोनों की बैठक अरेन्ज कराओ और उसके बाद पाठ्यक्रम की तैयारी भी। साझेदारी के बारे में हमारे चान्सलर और प्रो. चान्सलर महोदय निश्चय कर चुके हैं और हम उस बारे में उन लागों को अब डिस्टर्व नहीं करेंगे।’ कहते हुए उपकुलपति महोदय ने अपनी कुर्सी से उठते हुए बैठक सम्पन्न होने का इशारा किया और प्रति उपकुलपति जी को जैसे तनाव से बाहर खींचने की कोशिश में बोले- ‘चलो यार! एक्जीक्यूटिव केन्टीन तक टहलते हुए चलते हैं, वहां बैठकर एक-एक कप चाय का आनन्द लेंगे। रजिस्ट्रार नारायणन को भी बुलवाता हूँ।’
    कुछ ही दिन में कम्प्यूटर विज्ञान और न्यूक्लियर विज्ञान के समन्वय से पी.जी. स्तर का एक नया और विशेष पाठ्यक्रम प्रो. जयेन्द्र और प्रो. नारंग ने तैयार कर दिया, जो पूरे देश में अपनी तरह का अलग पाठ्यक्रम था। लक्ष्य था कम्प्यूटर विज्ञान और न्यक्लियर विज्ञान के पारस्परिक समन्वय की नई सम्भावनाओं की खोज तथा इस विषय पर कुछ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के भावी वैज्ञानिक तैयार करना। अमेरिका के सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय को तयशुदा नियमों के साथ अन्तर्राष्ट्रीय साझेदार बनाया गया। भारत के प्रधानमंत्री जी के द्वारा पाठ्यक्रम का शुभारम्भ किया गया। पहले बैच में देश के बेहद प्रतिभाशाली पन्द्रह छात्रों को प्रवेश मिला। इक्कीस माह तक कड़ी मेहनत और नई-नई खोजों और समन्वय से दोनों युवा प्रोफेसर्स ने पी.जी. स्तर के इस पाठ्यक्रम को शोध स्तर तक पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इक्कीस माह के बाद जब इन पन्द्रह भावी वैज्ञानिकों को नीलमणि विश्वविद्यालय ने अमेरिका रवाना करने से पूर्व एक शानदार कार्यक्रम में अनन्तिम डिग्री सौंपी, तो इस अवसर का साक्षी बनने के लिए कई केन्द्रीय मंत्रियों तक में होड़ लग गई थी। छात्रों के साथ अमेरिकी विश्वविद्यालय ने विशेष निमन्त्रण और बतौर स्पेशल गेस्ट तीन माह के लिए प्रो. जयेन्द्र और प्रो. नारंग को भी बुलाया।
    आज अमेरिकी विश्वविद्यालय में अपने छात्रों का आखिरी दिन था और नीलमणि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राठोर भी प्रो. सिन्हा के साथ वहां के समारोह में मौजूद थे। उनके मन में बेहद उत्साह था, कि कल जब अपने पन्द्रह होनहार भावी वैज्ञानिको के साथ वह भारत की भूमि पर लैण्ड करेगे, तो पूरा देश उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़ेगा। लेकिन यह क्या.......? समारोह के बाद सभी पन्द्रह छात्र और दोनों प्रोफेसर्स उनके पास आये, उनके चरण-स्पर्श किये और लगे आशीर्वाद मांगने, ‘सर हम सबको यहां अमेरिका में बेहद उच्च पैकेज पर काम करने का अवसर मिल गया है। आप हमें आशीर्वाद दीजिए कि हम यहां अपने देश नाम रौशन ....!’
   प्रो. राठोर को लगा जैसे वह गश खाकर गिर जायेंगे। बगल में खडे़ प्रो. सिन्हा ने  उन्हे सहारा दिया, ‘सर, सम्हालिए अपने-आपको। अब अफसोस करने से कोई फायदा नहीं, आपके सपनों के ये सत्रह फूल तो भू-मण्डल के स्वामी की भेंट चढ़ चुके हैंे।‘

 इन्टरनेट का मन्दिर
   प्रतीक बेहद निराशा की स्थिति में पापा के बेड के पास जमीन पर बैठा हुआ था। ‘साल भर ही तो हुआ है, पापा ने कितने अरमानों के साथ अपनी तमाम जमा-पूँजी लगाकर उसका दाखिला मेडीकल में करवाया था। और पापा आज स्वयं इस स्थिति में.....। कितने ही डाक्टर्स को दिखा लिया पर बीमारी का ही पता नहीं चल पा रहा है और उनकी हालत दिनोंदिन सीरियस होती जा रही है.....!’ प्रतीक की अपनी पढ़ाई तो आगे हो पाना असम्भव ही हो गया है, क्यों कि पापा के इलाज के लिए भी अब परिवार की सम्पत्तियां बेचने की नौबत आ चुकी है। ....‘हे भगवान! अब क्या करूँ.....  !’
    अचानक उसके दिमांग में एक विचार आया, क्यों न इन्टरनेट पर सर्च की जाये! मेडीकल की भाषा तो वह इस एक वर्ष में समझने ही लगा है। हो सकता है पापा की बीमारी का कोई समाधान मिल जाये! ग्लोबलाइजेशन के इस जमाने में तो हर बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान निकल आता है....!’ और प्रतीक अपना लैपटाप खोलकर इन्टरनेट पर सर्च करने बैठ गया।
   तीन-चार घंटे तक लक्षणों के आधार पर बीमारियों, विभिन्न बीमारियों के लक्षणों तथा मेडीकल केस स्टडीज आदि के सन्दर्भ में गहन खोज के बाद अचानक एक ऐसे केस का पता चला, जिसमें पैसेन्ट की बीमारी के लक्षण पापा की बीमारी से मिलते-जुलते थे। उसे यह भी पता चला कि इस पैसेन्ट का इलाज अमेरकिा के सुप्रसिद्ध डॉक्टर एबॉट ने किया था और वह इस तरह की बीमारियों पर शोध भी कर रहे हैं। प्रतीक ने अपने एक सीनियर प्रोफेसर डा. मिश्रा सर को कन्सल्ट करने के लिए फोन लगाया। डा. मिश्रा ने डा. एबॉट के बारे में बेहद उत्साहजनक जानकारी देते हुए बताया कि डा. एबॉट दिल्ली में बतौर विजिटिंग कन्सल्टेन्ट डा. शिराय के हास्पीटल में आते रहते हैं। हो सकता है उनका निकट भविष्य में भी कोई विजिट हो। डा. शिराय उनके परिचित हैं, वह थोड़ी देर में मालूम करके काल करेंगे। प्रतीक ने डा. मिश्रा को ‘थैंक्स सर’ कहकर फोन रखा तो एक आशा की किरण उसके अन्तर्मन में झांकने लगी थी। करीब आधा घंटा बाद इस अच्छी सूचना के साथ डा. मिश्रा सर का फोन आया कि डा. एबॉट परसों सुबह दिल्ली आ रहे हैं, और डा. शिराय ने उनकी रिक्वेस्ट पर उसी दिन शाम पाँच बजे का समय प्रतीक के पिता को देखने के लिए नियत करवा दिया है।
   नियत दिन और समय पर डा. एबॉट ने प्रतीक के पापा का चैक अप करके बताया- ‘इस तरह के लक्षणों वाले बहुत कम पैसेन्ट अब तक देखने में आये हैं और उनमें से एक-दो को छोड़कर कोई भी नही बचा है। दरअसल इस बीमारी के बारे में किसी पैसेन्ट पर कुछ एक्सपेरीमेन्ट जरूरी हैं, इसके लिए वह अभी तक किसी पैसेन्ट को तैयार नहीं कर पाये, अतः उनका शोध अधूरा ही है। परीक्षण पूरी तरह रिस्की है और पैसेन्ट के बचने की सम्भावना दो-चार प्रतिशत से अधिक नहीं है। आपके पैसेन्ट के बारे में भी इलाज न होने या वर्तमान सीमित नॉलेज के आधार पर इलाज किए जाने पर भी बचने की सम्भावना इससे अधिक नहीं है। और यदि आप लोग मुझे नियत परीक्षण इनके ऊपर करने की इजाजत दे दें, तब भी यही सम्भावना है। इनका बेटा मेडीकल पढ़ रहा है, वह मेरी बात को शायद समझ सके। परीक्षणों के बाद यदि बीमारी की पहचान और उसके निदान के अपने अनुमानों को कन्फर्म कर पाया, तो आपका पैसेन्ट तो बच ही जायेगा, भविष्य में इस बीमारी से अन्य लोगों को बचाना भी सम्भव हो जायेगा। न बचने की स्थिति में मैं अधिक कुछ तो नहीं कर सकता, पर कम्पन्सेशन के तौर प्रतीक की शेष पढ़ाई के व्यय के साथ कुछ और भी वित्तीय मदद आपके परिवार की करने को तैयार हूँ।’
   विदेशी डॉक्टर की बात सुनते ही प्रतीक के दादा जी क्रोध में आ गये- ‘ये विदेशी हमें समझते क्या हैं! हम यहाँ इलाज कराने आये हैं या अपने बीमार बेटे को इनकी खोज के लिए बेचने .......!’ उस वक्त हॉस्पीटल में मौजूद कुछेक पत्रकारों को पता चला, तो उन्होने भी इस मसले को ‘भारतीय बनाम विदेशी’ रंग मे रंगकर कई टी.वी. चैनलों पर प्रसारित करवा दिया। शाम होते-होते मुद्दा पूरे मीडिया में छाने लगा।
    प्रतीक ने इस पूरे मसले पर पापा के बारे में डॉक्टर एबॉट के बताए गये फैक्ट के साथ-साथ मेडीकल और सामाजिक नजरिए से सोचा, तो वह परेशान होने लगा। उसे लगा कि परीक्षण करना ही सही विकल्प है, पर दादाजी को कैसे समझाये, माँ से कैसे बात करे? काफी सोच विचार के बाद वह डाक्टर एबॉट से अकेले में मिला, और सारे प्रकरण में उनको लक्ष्य बनाये जाने पर माफी मांगते हुए परीक्षणों के लिए अपने परिवार को तैयार करने के लिए कुछ वक्त मांगा। डॉक्टर एबॉट ने इस पर सहृदयता दिखाते हुए कहा- ‘मैं समझ सकता हूँ।’
   इसके बाद प्रतीक ने साहस करके अपनी माँ और दादाजी को समझाया- ‘परीक्षण न करने पर हमें क्या हासिल होना है, पापा के बचने की सम्भावना न के बराबर है। और यदि परीक्षण के बाद उन्हें बचाया जा सका तो हमारी खुशियाँ तो लौट ही आयेंगी, हम मेडीकल साइन्स की प्रगति और समाज की भलाई में भी सहभागी बन जायेंगे ......।  इसलिए प्लीज आप अपनी सहमति दे दीजिए.....!’ कई घंटे तर्क-वितर्क चला, और अन्ततः दादाजी मान गये। अगले दिन पूरा परिवार डॉक्टर एबॉर्ट से मिला, और पिछले दिन जो कुछ हुआ, उसके लिए उनसे क्षमा मांगते हुए परीक्षण और इलाज करने का अनुरोध किया।
   सौभाग्य से परीक्षण सफल रहे। बीमारी की सही पहचान और निवारण को लेकर डॉक्टर एबॉट के अनुमान बिल्कुल सटीक निकले। पूरे मीडिया में इस प्रकरण के दूसरे और सही पक्ष की चर्चा भी पूरे देश ने देखी-सुनी। प्रतीक के पापा का इलाज सफलतापूर्वक हुआ और अगले कुछ माह में पूरी तरह ठीक हो गये।
   आज घर में खुशियों-भरा माहौल था। प्रतीक की माँ ने सभी लोगों से भगवान का धन्यवाद और दर्शन करने मन्दिर चलने का अनुरोध किया तो प्रतीक ने याद दिलाया- माँ, असली कृपा करने वाला भगवान तो इन्टरनेट है, जिसने हमें डॉ. एबॉट से मिलवाया। और इस ग्लोबल भगवान का मन्दिर यह मेरा लैपटाप है, पहले इसके आगे तो मत्था टेक लो .....! और .... यदि हम सब अपने सामाजिक नजरिए को परिवार और देश की सीमाओं से परे भी विस्तार दे पायें तो........!